एक बगीचे में तरह-तरह के फूल खिले थे। एक युवक बगीचे के बागबान से प्रतिदिन कुछ फूल लेकर मंदिर में अर्पित करने जाया करता था। एक दिन माली ने पूछा, ‘बेटे जानते हो यह फूल एक मौन संवाद हैं।’ ‘अच्छा! मगर कैसे?’ युवक ने जानना चाहा। ‘बेटे यह फूल हमको मौन भाषा में यह बताता है कि हमको अगर देवता के समीप जाना है तो अपना मन सुगन्धित करना होगा। फूल जैसी कोमलता और क्षणभंगुरता को सहज स्वीकार करना होगा। खिलना केवल औरों के लिए मगर शालीन बने रहना हमको फूल ही सिखाते हैं। इस तरह हंसकर जीना और देवत्व पर अर्पित हो जाना सीख लिया तो देवता पर फूल चढ़ाना सार्थक है।’
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