एक दिन एक स्कूल इंस्पेक्टर शहर से स्कूल का निरीक्षण करने के लिए आए। सहसा इंस्पेक्टर ने एक कठिन सवाल बच्चों से पूछ लिया। उसका जवाब किसी विद्यार्थी को नहीं आया। शिक्षक के चेहरे पर भय से पसीने की बूंदें छलकने लगीं। तभी स्कूल की खिड़की से झांकता एक अनजान बालक का चेहरा शिक्षक को दिखा। वह कुछ समझ पाते, तभी वह अनजान बालक कक्षा के अंदर आकर बोला, ‘सर इसका जवाब मुझे पता है।’ उस बालक ने बड़ी सहजता से इंस्पेक्टर के कठिन प्रश्न का जवाब दे दिया। यह देखकर इंस्पेक्टर दंग होकर बोले, ‘बेटा, तुम किस कक्षा में पढ़ते हो?’ बालक भोलेपन से बोला, ‘मैं किसी कक्षा में नहीं पढ़ता। मैं तो इस ओर अपनी गाय चराने आता हूं। शिक्षक की बातंे मुझे बहुत अच्छी लगती हैं। इसलिए मैं कक्षा की खिड़की से उनकी बातें सुनता रहता हूं। ये जानकर तो स्कूल इंस्पेक्टर, शिक्षक समेत सभी विद्यार्थी दंग रह गए। उसी समय स्कूल इंस्पेक्टर ने बच्चे का प्रवेश कराने के साथ-साथ उसे छात्रवृत्ति प्रदान करने का निर्देश दिया। इस तरह बालक की शिक्षा शुरू हुई। आज पूरी दुनिया उस बालक को डॉ. राधा बिनोद पाल के नाम से जानती है। ये वही बिनोद पाल हैं जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत का मस्तक गर्व से ऊंचा कर दिया था। डॉ. राधा बिनोद पाल एक प्रसिद्ध भारतीय न्यायविद् थे, उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद टोक्यो ट्रायल में अपने अकेले असहमतिपूर्ण निर्णय से पूरी दुनिया को हिला दिया था।
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