एक दिन जब सुकरात एथेंस की गलियों से गुजर रहे थे, तब एक युवक उनके पास आया और बोला, ‘लोग कहते हैं कि आप सबसे बुद्धिमान हैं, फिर भी आप स्वयं को अज्ञानी क्यों कहते हैं?’ सुकरात मुस्कुराए और बोले, ‘तुम क्या जानते हो?’ युवक ने गर्व से उत्तर दिया, ‘मैं बहुत कुछ जानता हूं।’ सुकरात ने पास पड़े घड़े की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘यदि यह घड़ा पहले से भरा हो, तो क्या इसमें नया जल डाला जा सकता है?’ युवक बोला, ‘नहीं।’ तब सुकरात ने शांत स्वर में कहा, ‘यही कारण है कि मैं स्वयं को अज्ञानी कहता हूं, ताकि सीखने की जगह बनी रहे।’ युवक कुछ देर चुप रहा और फिर बोला, ‘तो क्या यही सच्ची बुद्धि है?’ सुकरात ने उत्तर दिया, ‘जो अपनी सीमाएं पहचान लेता है, वही आगे बढ़ने योग्य होता है।’ उस दिन युवक ने समझा कि अहंकार ज्ञान को रोकता है, और विनम्रता ही सीखने का द्वार खोलती है।
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