Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
search-icon-img
Advertisement

प्रतिबद्धता की पत्रकारिता

एकदा

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

एक बार पं. बनारसीदास चतुर्वेदी जी के पास एक राजसी संदेश आया कि फलां-फलां जगह जितनी प्याऊ लगाई गई हैं उस संबंध में विस्तृत विवरण मधुकर पत्रिका में प्रकाशित किया जाये। लेकिन बनारसीदास जी ने साफ मना कर दिया और ओरछा नरेश को वापसी संदेश भेजकर पत्रिका का संपादन कार्य भी त्याग दिया। सन‍् 1930 में उन्होंने ओरछा नरेश वीरसिंह जू देव के प्रस्ताव पर टीकमगढ़ जाकर ‘मधुकर’ नाम के पत्र का संपादन आरंभ किया था। नरेश ने उन्हें उनके निर्विघ्न व निर्बाध संपादकीय अधिकारों के प्रति आश्वस्त कर रखा था लेकिन बाद में उन्होंने पाया कि राजा साहब ‘मधुकर’ को राष्ट्रीय चेतना की जगह ‘दरबारी’ ही बने रहने देना चाहते हैं, तो वह हट गये। प्रसिद्ध हिन्दी लेखक, पत्रकार, राज्यसभा सांसद, 'विशाल भारत' नामक हिन्दी मासिक के संपादक एवं साक्षात्कार की विधा को पुष्पित एवं पल्लवित करने वाले पद्मभूषण पं. बनारसीदास चतुर्वेदी जी एक समर्पित साहित्य सेवी थे। वह प्रतिदिन दर्जनों पत्र लिखा करते थे। उनका पत्र व्यवहार तथा विविध विभूतियों को लिखे गए पत्र आज भी पुस्तकालयों में सुरक्षित हैं। भारत के स्वतन्त्र होने के पश्चात चतुर्वेदी जी बारह वर्ष तक राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे और 1973 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।

Advertisement
Advertisement
×