मिस्र के महान संत जुन्नुन के पास एक बार एक युवक धर्म की दीक्षा लेने आया। संत ने उसे एक संदूकची दी और कहा कि यह नील नदी के पास रहने वाले मेरे एक मित्र को दे आओ। युवक संदूकची लेकर चल पड़ा, लेकिन रास्ते में वह अपनी उत्सुकता को न रोक पाया और संदूकची को खोलकर देखने लगा। संदूकची के खुलते ही उसमें बंद एक चूहा छलांग लगा के बाहर निकल भागा। खाली संदूकची को लेकर जब वह संत के मित्र के पास गया तो संदूकची को खाली पाकर वह मित्र बोला, ‘यह संदूकची तुम्हारे संयम की परीक्षा लेने के लिए भेजी गई थी, पर तुम अपने संयम पर नियंत्रण न रख सके और संदूकची को खोल बैठे। धर्म का ज्ञान पाने के लिए जिस धैर्य और संयम की जरूरत होती है, उसका तुम्हारे पास नितांत अभाव है। तुम्हारे लिए बेहतर यही रहेगा कि पहले तुम अपने चित्त की दुर्बलता दूर करो और उसके बाद ही धर्म की दीक्षा लेने की बात सोचो।’
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