ग्रीस के प्रसिद्ध दार्शनिक प्लेटो हर क्षण कुछ नया जानने के लिए उत्सुक रहते थे। प्रायः शीर्षस्थ बुद्धिजीवी और अन्य जिज्ञासु उनके पास पहुंचते और अपनी-अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त करते। प्लेटो भी उनसे कुछ न कुछ नई जानकारी लेने का प्रयास करते। एक दिन प्लेटो ने विज्ञान के एक शिक्षक की अध्यात्म संबंधी जिज्ञासा का समाधान करने के बाद उससे विज्ञान संबंधी कोई जानकारी ली। शिक्षक के चले जाने के बाद शिष्य ने कहा, ‘सर! आप संसार के प्रसिद्ध विद्वान और दार्शनिक हैं। जब आप आगंतुकों से कुछ पूछते हैं, तो हमें ग्लानि महसूस होती है। आप इतने बड़े ज्ञानी होने के बावजूद ऐसा क्यों करते हैं?’ संत प्लेटो ने उसे समझाते हुए कहा, ‘वत्स, ज्ञान अथाह है। उसकी कोई सीमा नहीं होती। मेरा ज्ञान भी उतना ही सीमित है, जितनी समुद्र की एक बूंद। पूर्ण ज्ञानी होने का कोई दावा नहीं कर सकता। जो ऐसा करता है, वह झूठा और अहंकारी होता है।’ शिष्य प्लेटो की निरभिमानता के समक्ष नतमस्तक हो गया।
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