यह प्रसंग 1939 का है। उस समय पंडित दीनदयाल जी अंग्रेज़ी साहित्य विषय लेकर एम.ए. की पढ़ाई कर रहे थे। वे आगरा के सेंट जॉन कॉलेज के छात्र थे और अपने एक मित्र के साथ कमरा लेकर रहते थे। एक दिन दोनों मित्र सब्ज़ी खरीदकर अपने कमरे की ओर जा रहे थे कि दीनदयाल जी अचानक असहज हो गए। उन्होंने बताया कि उनकी जेब में एक-एक पैसे के कुल तीन सिक्के थे, जिनमें से एक घिसा हुआ खोटा सिक्का था। जिन अम्मा से उन्होंने दो पैसे की सब्ज़ी खरीदी थी, उन्हें वही खोटा सिक्का दे आए थे। दीनदयाल जी की बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी। वे वापस बाज़ार गए और सब्ज़ी बेचने वाली मां को सारी बात बताई। दुकानदार मां ने उन्हें माफ़ करते हुए कहा, ‘बेटा! जैसा किसी के भाग्य में हानि-लाभ लिखा होता है, वैसा ही होता है। तुम जाओ, अपनी शुद्ध भावना के कारण तुम खूब तरक्की करोगे।’ लेकिन दीनदयाल जी तीसरा खरा सिक्का देकर और अपना खोटा सिक्का वापस लेकर ही माने। इसके बाद उनके चेहरे पर उभरे संतोष को कोई भी देख सकता था। यही दीनदयाल जी आगे चलकर एक प्रतिष्ठित दार्शनिक, लेखक तथा राजनीति में समाज का मार्गदर्शन और नेतृत्व करने वाले बने। सन् 1967 में उन्हें भारतीय जनसंघ का अखिल भारतीय अध्यक्ष बनाया गया।
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