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कष्ट दूर करने वाले ‘भक्त शिरोमणि’ हनुमान

जन्मोत्सव 2 अप्रैल

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अनगिन गुणों के स्वामी और भगवान शिव के 11वें रुद्र के रूप में त्रेतायुग में पृथ्वी पर अवतरित होने वाले हनुमानजी एक सक्षम गुरु, मार्गदर्शक, अन्वेषक, साधक एवं भक्ति के सिरमौर ‘भक्त शिरोमणि’ हैं। वैसे तो, भक्त और साधक हनुमद् उपासना सालों भर करते ही हैं, लेकिन महावीर हनुमानजी महाराज की उपासना का एक प्रमुख अवसर हनुमान जन्मोत्सव भी होता है।

बल, बुद्धि, विद्या, शक्ति, भक्ति, मुक्ति, आस्था, पराक्रम, पुरुषार्थ, कर्तव्य परायणता, कर्मठता, वैराग्य, विनम्रता, निःस्वार्थ सेवा-भावना और मर्यादा-पालन के मामले में तीनों लोकों में अद्वितीय हनुमानजी महाराज सामान्य जनों के साथ-साथ ऋषि-मुनि, संत और साधु समाज की भी पूर्ण आस्था के केन्द्र हैं। अनगिन गुणों के स्वामी और भगवान शिव के 11वें रुद्र के रूप में त्रेतायुग में पृथ्वी पर अवतरित होने वाले हनुमानजी एक सक्षम गुरु, मार्गदर्शक, अन्वेषक, साधक एवं भक्ति के सिरमौर ‘भक्त शिरोमणि’ हैं। वैसे तो, भक्त और साधक हनुमद् उपासना सालों भर करते ही हैं, लेकिन महावीर हनुमानजी महाराज की उपासना का एक प्रमुख अवसर हनुमान जन्मोत्सव भी होता है, जो प्रत्येक वर्ष चैत्र महीने की पूर्णिमा तिथि को पूर्ण श्रद्धा एवं भक्ति के साथ संपूर्ण भारत में मनाया जाता है। इस वर्ष ‘श्री हनुमान जन्मोत्सव’ 2 अप्रैल को मनाया जायेगा।

‘हनुमान जयंती’ विशिष्ट अवसर

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शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार, ‘हनुमान जयंती’ के अवसर पर हनुमानजी महाराज का तत्त्व पृथ्वी पर अन्य अवसरों की अपेक्षा 1000 गुना अधिक सक्रिय रहता है। इसलिए इस तिथि को हनुमानजी के मंत्र ‘श्री हनुमते नमः’ का जप करने पर ‘हनुमान तत्त्व’ का अधिकाधिक लाभ मिलता है। शास्त्रों में वर्णन है कि इस अवसर पर हनुमानजी के नामजप करने से अनिष्ट अथवा बुरी शक्तियों से पीडित व्यक्ति के सभी शारीरिक, मानसिक, भौतिक एवं आध्यात्मिक कष्टों और बाधाओं का निवारण होता है। इनके अतिरिक्त, नामजप करने वाले व्यक्ति को हनुमानजी के चैतन्य का लाभ भी मिलता है। शास्त्र बताते हैं कि विधिवत‍्, निर्विरोध एवं भावपूर्ण नामजप संपन्न हो सके इसके लिए, नामजप आरंभ करने से पूर्व भक्तों को श्री हनुमानजी महाराज के चरणों में इस हेतु प्रार्थना करनी चाहिए।

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प्रबल प्रकट शक्ति

अन्य देवताओं की तुलना में हनुमानजी में अत्यधिक प्रकट शक्ति है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार अन्य देवताओं में प्रकट शक्ति केवल 10 प्रतिशत होती है, जबकि हनुमानजी में यह शक्ति 72 प्रतिशत होती है। हनुमानजी महाराज की उपासना से कुंडलिनी जागरण के मार्ग में आने वाली बाधाएं दूर हो जाती हैं तथा कुंडलिनी को उचित दिशा भी मिलती है। साथ ही, भूत-बाधा, जादू-टोना, अथवा पितृदोष जनित कष्टों, शनि-पीडा आदि का निवारण भी होता है। सनातनी मान्यताओं के अनुसार, लंबी बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति को स्वस्थ करने के लिए हनुमानजी के मंदिर में ले जाने से मनोवांछित लाभ प्राप्त होता है।

मंत्र का उपयोगी प्रयोग

हिंदू संस्कृति में देवी-देवताओं की पूजा-आराधना में मंत्रों के प्रयोग की बड़ी महिमा बतायी गयी है। शास्त्र बताते हैं कि हनुमानजी को प्रसन्न करने के लिए मंत्रों का प्रयोग अत्यंत उपयोगी एवं कारगर होता है।

उपासना का विशेष अवसर

सनातन धर्म में शनिवार और मंगलवार हनुमानजी की उपासना के लिए विशेष अवसर माने जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इन दोनों दिनों को हनुमानजी की उपासना करने से श्रीराम भक्त हनुमानजी शीघ्र प्रसन्न होते हैं। शास्त्रों में वर्णन है कि इन दोनों दिनों को मंदिर में हनुमानजी को सिंदूर एवं तिल का तेल अर्पित करने के अद्भुत लाभ होते हैं। वहीं, कुछ हनुमान मंदिरों में नारियल अर्पित करने की भी प्रथा है।

नामजप का महत्त्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कलियुग में सर्वश्रेष्ठ, सरल, सुलभ तथा भगवान एवं अपने ईष्ट देवता से सतत सान्निध्य बनाये रखने वाली एकमात्र उपासना उस देवता का नामजप है। शास्त्रों में बताया गया है कि अपने ‘ईष्ट’देवता का तत्त्व’ अधिकाधिक ग्रहण करने के लिए नामजप का ठीक-ठीक उच्चारण करना आवश्यक होता है।

पंचमुखी अवतार

रामायण की कथा के अनुसार, लंका में श्रीराम-रावण युद्ध के समय जब रावण के भाई अहिरावण अपनी मायावी शक्तियों के प्रयोग से स्वयं भगवान श्रीराम और लक्ष्मणजी को मूर्च्छित कर पाताल लोक ले गया था, तब हनुमानजी भी उसका पीछा करते हुए पाताल लोक पहुंचे थे। वहां पर उन्होंने देखा कि अहिरावण ने पांचों दिशाओं में पांच दिये जला रखे हैं। दरअसल, उसे यह वरदान प्राप्त था कि जब तक कोई इन पांचों दीपकों को एक साथ नहीं बुझायेगा, अहिरावण का वध नहीं किया जा सकेगा। अहिरावण की इसी माया को समाप्त करने के लिए श्रीराम भक्त हनुमानजी ने पंचमुखी अवतार लिया और पांचों दीपकों को एक साथ बुझाने के बाद अहिरावण का वध किया था। इसके उपरांत तीनों लोकों के स्वामी प्रभु श्रीराम और लक्ष्मणजी अहिरावण के बंधन से मुक्त हो पाये थे।

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