प्राचीन भारत में अद्वैत वेदांत के महान दार्शनिक आदि शंकराचार्य बाल्यावस्था में ही असाधारण प्रतिभा के लिए प्रसिद्ध हो चुके थे। वे देशभर में भ्रमण कर शास्त्रार्थ करते और लोगों को तर्क द्वारा सत्य समझाते थे। एक बार वे अपने शिष्यों के साथ काशी में गंगा स्नान के लिए जा रहे थे। मार्ग में उन्हें एक चांडाल मिला, जो शव उठाने का कार्य करता था। शंकराचार्य ने अनजाने में उससे मार्ग छोड़ने को कहा। चांडाल ने शांत स्वर में प्रश्न किया कि आप किसे हटने को कह रहे हैं, इस शरीर को या उस चेतना को जो इस शरीर में विद्यमान है। यह सुनकर शंकराचार्य ठिठक गए। वे समझ गए कि यह प्रश्न किसी साधारण व्यक्ति का नहीं हो सकता। उनके भीतर का दार्शनिक जाग उठा। उन्होंने वहीं रुककर विचार किया कि यदि ब्रह्म सर्वत्र है, तो ऊंच-नीच का भेद कैसे सत्य हो सकता है। शंकराचार्य ने तुरंत उस चांडाल के चरणों में प्रणाम किया। उनके शिष्यों को यह दृश्य समझ में नहीं आया। शंकराचार्य ने कहा कि जो व्यक्ति सत्य का बोध करा दे, वही गुरु है, चाहे वह किसी भी अवस्था में क्यों न हो। बाद में इसी अनुभव से प्रेरित होकर उन्होंने मनुष्य मात्र में एक ही चेतना होने का संदेश अधिक दृढ़ता से दिया।
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