एक विद्यार्थी ने अपने गुरु से पूछा ‘गुरुदेव! चरक संहिता में अनेक स्थलों पर लोभ को रोकने की बात कही गई है और इसका संबंध रोगों से भी जोड़ा गया है, लेकिन मन में उत्पन्न होने वाली इस प्रवृत्ति को आखिर रोका कैसे जाए?’ गुरुजी ने सीधे उत्तर देने के बजाय उससे पूछा, ‘बताओ, हम अपनी आवश्यकता से अधिक जितना भी धन, वस्तुएं और साधन जीवन भर संचित करते हैं, क्या वे अंत में हमारे साथ जाते हैं?’ शिष्य ने उत्तर दिया, ‘नहीं गुरुदेव।’ गुरुजी बोले, ‘बस, इसी ‘नहीं’ को यदि मनुष्य समय रहते समझ ले तो लोभ पर नियंत्रण की शुरुआत हो सकती है। इच्छाएं जीवन का स्वाभाविक अंग हैं और मनुष्य को कर्म तथा प्रगति के लिए प्रेरित करती हैं, लेकिन जब हमारी इच्छाएं हमारी आवश्यकताओं से बहुत आगे निकल जाती हैं तो वे लोभ का रूप धारण कर लेती हैं। लोभ की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि इसकी कोई अंतिम सीमा नहीं होती। इसलिए लोभ को रोकने का अर्थ इच्छाओं को पूरी तरह समाप्त करना नहीं, बल्कि विवेक और आत्मसंयम द्वारा उन्हें अपने ऊपर हावी न होने देना है। लोभ को कम करने का एक प्रभावी उपाय दान और बांटने की प्रवृत्ति भी है। संग्रह मन को संकुचित करता है, जबकि दान मन का विस्तार करता है।’
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