भारत की संत परंपरा में संत रविदास सामाजिक समरसता, प्रेम और मानवता के महान प्रवक्ता हैं। मध्यकालीन विषमताओं, जातिभेद और आडंबरों के विरुद्ध उन्होंने भक्ति, करुणा और समानता का संदेश दिया। राम, रहीम और मानव एकत्व की उनकी वाणी आज भी शांति, बंधुत्व और न्यायपूर्ण समाज की प्रेरणा देती है। यह दर्शन समावेशी संस्कृति और नैतिकता का पथ दिखाता है।
रत्नगर्भा भारत माता सदा से ही ऋषि-मुनियों, साधु-संतों, महात्माओं और देवताओं की भूमि रही है। इस धरा धाम पर एक से बढ़कर एक महान और दिव्य महापुरुषों ने अवतार धारण कर इस भूमि को अपने मन-प्राणों से सींचा है। उन्होंने अपने कर्म और सिद्धांत द्वारा संपूर्ण मानव समाज को आपस में मेल-जोल के साथ यानी समरस भाव से जीविका चलाते हुए आगे बढ़ने का संदेश दिया। परिवार और समाज में बिना किसी भेदभाव के प्रेम एवं भाईचारे के साथ जीवनयापन करने की यह सनातन परंपरा ही वास्तव में हमारी हिंदू सस्कृति का आधार है। मानवतावादी चिंतन एवं बंधुत्व भाव से ओत-प्रोत सामाजिक समरसता के इस सिद्धांत के माध्यम से संपूर्ण विश्व समुदाय को युद्ध के बदले शांति और घृणा के बदले प्रेम के साथ जीवन जीने का दर्शन भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण, बुद्ध, महावीर आदि हमारे पूर्वजों ने दिया। समरसता के इसी विचार तत्त्व को संत कबीर ने अपने ‘प्रेम नगर’ में उजागर किया तथा गुरु नानकदेव ने भी अपनी वाणी में प्रायः इसी समरस भाव का प्रकटीकरण किया है। जीव और जगत के कल्याण की सदिच्छा से प्रेरित होकर सृष्टि के कार्यों को आगे बढ़ाने वाले अनेकानेक महापुरुषों में एक प्रमुख नाम संत रविदास जी का भी है, जिन्होंने सभ्यता और कुलीनता के कथित बोध के कारण ऊपजे सामाजिक अंतर्विरोधों के मध्यकालीन अंधेरे में डूबी मानवता को संकटों से उबारने की संवेदनशील पहल की।
जन्म से जुड़ा रहस्य
हिंदी की भक्ति काव्यधारा में सर्वथा पृथक एवं विलक्षण पहचान रखने वाले संत रविदास जी का अवतरण मध्ययुगीन संक्रमण काल के दौरान धर्मनगरी ‘अनादि काशी’ की पवित्र धरती पर एक चर्मकार परिवार में हुआ। इनके पिता का नाम रग्घू अथवा राघव एवं माता का करमा था। अन्य अनेक सिद्ध संतों, गुरुओं और महात्माओं की तरह ही इनके भी जन्म के स्थान और समय को लेकर कोई स्पष्ट, उपयुक्त एवं प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं होने के कारण भक्तों, अन्वेषकों, लेखकों और विद्वानों में प्रायः मतभेद रहा है। इनमें से कुछ विद्वानों के अनुसार इनका जन्म सन् 1441 से 1455 के बीच रविवार को पड़ी किसी माघ पूर्णिमा के दिन मांडुर नामक गांव में हुआ था, जिसे आजकल मंडुआडीह कहा जाता है। वहीं, कुछ विद्वान इनका जीवनकाल 1370 से 1518 तो कुछ अन्वेषक 1482 से 1527 ई. के बीच मानते रहे हैं, जबकि कुछ लेखकों के अनुसार, इनका जन्म 1376 ईस्वी की माघ पूर्णिमा को उत्तर प्रदेश स्थित वाराणसी शहर के गोबर्धनपुर गांव में हुआ था।
नाम अनेक
रविवार को जन्म लेने के कारण माता-पिता ने इनका नाम ‘रविदास’ रखा। हालांकि, इनका लोक-प्रचलित नाम ‘रैदास’ है, जिसकी पुष्टि इन्होंने स्वयं भी की है- ‘नीचे से प्रभु आंच कियो है, कह रैदास चमारा।’ वैसे, कई अन्य रचनाकारों ने भी अपनी-अपनी रचनाओं में बार-बार ‘रैदास’ के रूप में ही इन्हें उद्धृत किया है। इसके अतिरिक्त, देश के भिन्न-भिन्न प्रान्तों में संत रविदास जी को कई अन्य नामों से भी जाना गया, यथा- पंजाब में इन्हें ‘रविदास’ तो उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश एवं राजस्थान में ‘रैदास कहा गया, जबकि गुजरात एवं महाराष्ट्र में ये ‘रोहिदास’ के नाम से जाने गये तो बंगाल में ‘रुइदास’ के रूप में प्रसिद्ध हुए। वहीं, कई पुराने ग्रंथों की पांडुलिपियों में इनका नाम रायादास, रेदास, रेमदास और रौदास के रूप में भी अंकित है।
संत शिरोमणि
संत रविदास जी वैष्णव भक्तिधारा के महान संत और गुरु स्वामी रामानंद जी के प्रिय शिष्य थे। भक्ति साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले प्रसिद्ध संत कबीरदास इनके समकालीन और गुरुभाई थे। संत रविदास जी के संबंध में चर्चा करते हुए स्वयं कबीरदास जी ने ‘साधुन में रविदास संत’ कहकर इनको सम्मानित करने का कार्य किया था। इसी प्रकार, महान संत नाभादास जी के द्वारा रचित ‘भक्तमाल’ नामक विशिष्ट धार्मिक ग्रंथ, जिसमें संत रविदास जी के स्वभाव एवं इनकी चारित्रिक भव्यता और दिव्यता का वर्णन मिलता है, की टीका लिखते हुए दिव्य संत प्रियादास जी ने लिखा है कि चित्तौड़ की महारानी मीराबाई, जो महाराणा सांगा की पत्नी थीं, रविदास जी की प्रसिद्ध शिष्या थीं। वहीं, मीराबाई जी ने स्वयं भी संत रविदास जी के प्रति अपने शिष्यत्व-भाव को व्यक्त करते हुए लिखा है- ‘गुरु रैदास मिले मोहि पूरे, धुरसे कलम भिड़ी, सतगुरु सैन दई जब आके जोत रली।’
भक्तिमार्ग में बाधक
रविदास जी ने अभिमान को भक्तिमार्ग में बाधक बताते हुए लिखा है- ‘कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै, तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।’ तात्पर्य यह कि जिस प्रकार, विशाल हाथी शक्कर के कणों को चुनने में असमर्थ रहता है, जबकि लघु देहधारी ‘पिपीलिका’ यानी चींटी इन कणों का सहजता से भक्षण कर लेती है, उसी प्रकार, अभिमान शून्य होकर विनम्रतापूर्वक आचरण करने वाला मनुष्य ही ईश्वर का भक्त हो सकता है।
विषमताओं के विरुद्ध चेतना
रविदास जी के काल में देश के कुछ क्षेत्रों में मुगलों का शासन कायम हो चुका था। उस दौरान समाज में चहुं ओर शोषण, दमन, उत्पीड़न, अत्याचार, गरीबी, भ्रष्टाचार, अशिक्षा, ऊंच-नीच, छुआछूत, वर्णभेद, जातिभेद, अंधविश्वास एवं आडंबर समेत अनेक प्रकार की सामाजिक विषमताएं व्याप्त थीं, जिसके शिकार एक अन्त्यज के रूप में रविदास जी स्वयं भी हुए थे। उदाहरण के लिए, सामाजिक एवं आर्थिक विषमता के पोषक और समर्थक लोग इनकी माता जी को घृणा-भाव से ‘घुरबिनियां’ कहते थे। अपनी माता के प्रति ऐसे व्यवहारों से इन्हें चोट तो पहुंचती थी, परंतु ये सर्वाधिक दुखी तब होते थे, जब इन सामाजिक विद्रूपताओं को सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक संरक्षण मिलते हुए देखते थे। इन सामाजिक विषमताओं के विरुद्ध संत, कवि एवं आध्यात्मिक गुरु रविदास जी ने सामाजिक समरसता के विचार का उद्घोष किया था। बता दें कि, उनके सम्पूर्ण चिंतन का सार ही समाज का समरस होना है, जब वे बेगमपूरा की बात करते हैं तो उसका आधार बंधुत्व एवं प्रेम भाव को रखते हैं, जो समरसता का मूल तत्व है।
विवादों पर प्रहार
रविदास जी ने धार्मिक आडंबरों और विवादों को सारहीन एवं निरर्थक मानते हुए लिखा है- ‘कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा, वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।’ जब रविदास जी कहते हैं कि ‘जब सभ कर दोउ हाथ पग दोउ नैन दोउ कान, रविदास पृथक कइसे भये हिंदू औ मुसलमान’, तो ये ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की महानतम सनातनी संकल्पना को और सुदृढ़ एवं अपरिहार्य बताते हुए आगे बढ़ते हैं। सचमुच, मानवता और मानुषी नैतिकता के किसी भी सिद्धांत के अंतर्गत मानव-मानव के बीच के उपर्युक्त पार्थक्य को उचित नहीं ठहराया जा सकता। बहरहाल, सांप्रदायिक सद्भाव एवं सामाजिक समरसता के आध्यात्मिक उपासक रविदास जी ने जीवन और समाज के तमाम अंतर्विरोधों के समानांतर समाधानों की जो फुलवारी लगाई थी, उसकी महक आज भी समाज में व्याप्त है और सांप्रदायिक सद्भाव तथा समरसता के उपासकों को रोमांचित करती है।

