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सनातन धर्म के महान रक्षक

गुरु तेग बहादुर जन्मोत्सव 7 अप्रैल

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गुरु तेग बहादुर ने सनातन धर्म की रक्षा के लिए अपना जीवन अर्पित किया, उनका बलिदान भारतीय संस्कृति और कर्तव्य का प्रतीक है।

सन‍् 1675 में भारत ऐसी ही कठिनतम परिस्थितियों से गुजर रहा था, जब औरंगजेब के नेतृत्व में वृहत स्तर पर देशभर में हिन्दुओं पर धर्म परिवर्तन कर इस्लाम स्वीकार करने के लिए दबाव डाला जा रहा था। उन्हें तरह-तरह की यातनाएं दी जा रही थीं। उन पर जजिया कर सहित तरह-तरह के आर्थिक एवं दमनात्मक कार्रवाइयों के माध्यम से इस्लामी शासन-व्यवस्था को परिपुष्ट करने की कोशिशें लगातार जारी थीं।

सनातन आस्था पर संकट

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यही वह समय था जब काशी स्थित भगवान विश्वनाथ, गुजरात स्थित भगवान सोमनाथ एवं मथुरा स्थित श्रीकेशव राय मंदिरों को ध्वस्त करने के आदेश दिये गये। उन दिनों भारत में औरंगजेब का अत्याचार इतना बढ़ गया था कि हिन्दुओं को अपने ही देश में सार्वजनिक रूप से अपने पर्व-त्योहारों को मनाने की स्वतंत्रता नहीं थी। उन पर तरह-तरह के अत्याचार किये जाते थे। औरंगजेब के शासन काल में संपूर्ण सनातन धर्म पर ही गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया था।

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महान पराक्रमी

गुरु तेग बहादुर का जन्म वैशाख कृष्णपक्ष पंचमी, विक्रमी संवत 1678 को पवित्र शहर अमृतसर में गुरु के महल नामक घर में हुआ था। इस वर्ष यह तिथि 7 अप्रैल को है। ये गुरु हरगोबिंद साहिब और माता नानकी जी के पांचवें और सबसे छोटे पुत्र थे। पेंदा खान के खिलाफ करतारपुर की लड़ाई में महान पराक्रम दिखाने के बाद ये ‘तेग बहादुर’ कहलाये।

स्वधर्म की लगन

गुरु तेग बहादुर बचपन से ही एकांतप्रिय थे। ये खेलने-कूदने के बजाय एकांत स्थान पर शांतिपूर्वक बैठने, ध्यान करने और चिंतन-मनन करने में अपना अधिकांश समय व्यतीत करते थे। इस प्रकार, इन्हें विचारों में लीन देखकर परिजन चिंतित रहते थे। वे चाहते थे कि अन्य बच्चों की तरह ‘तेग बहादुर’ भी बाहर मित्रों संग खेलने-कूदने जायें, लेकिन गुरु तेग बहादुर को तो बचपन से ही ‘स्वदेश’ और ‘स्वधर्म’ से लगन लग चुकी थी।

त्याग के अनेक प्रतिमान

इनके घर-परिवार में सदा ही धार्मिक वातावरण रहता था, जिसके कारण इनमें एक विशिष्ट दार्शनिक सोच विकसित हुई। ये बचपन से ही अत्यंत उदार प्रकृति वाले किंतु दृढ़ निश्चयी व्यक्ति थे। कालांतर में इन्होंने नि:स्वार्थ सेवा और त्याग के अनेक प्रतिमान गढ़े, जिसने अनेकानेक भारतीयों को प्रेरित और प्रभावित किया। गुरु तेग बहादुर ने बचपन में नियमित विद्यालयी शिक्षा ग्रहण करने के अतिरिक्त शास्त्रीय संगीत, गायन और वाद्य संगीत जैसी कलाएं सीखीं और घुड़सवारी, तलवारबाजी, भाला फेंक एवं निशानेबाजी जैसे सैन्य प्रशिक्षण भी लिया था। वहीं, भाई गुरदास जी ने इन्हें गुरबानी और हिंदू पौराणिक कथाओं का भी अध्ययन कराया। इस प्रकार, गुरु तेग बहादुर के रूप में महान भारत माता के सेवार्थ एक महान पराक्रमी योद्धा एवं असाधारण रहस्यवादी गुरु का अवतरण हुआ।

गुरुजी की शरण में कश्मीरी

उस समय कश्मीर के हिन्दुओं की स्थिति देश भर में सर्वाधिक बुरी थी। इस्लाम नहीं स्वीकार करने के कारण उस दौरान हजारों कश्मीरी पंडितों का नरसंहार किया गया और उनकी संपत्तियां लूट ली गयीं। कठोर अत्याचारों से तंग आकर कश्मीरी पंडितों का एक जत्था अंततः गुरु तेग बहादुर की शरण में पहुंचा और इन्हें अपनी व्यथा-कथा सुनायी।

सनातन सत्य में आस्था

पंडितों की व्यथा सुनकर गुरुजी ने समाधान निकालने का निश्चय किया। मुगलों के दरबार आगरा पहुंचकर इन्होंने औरंगजेब को समझाने का प्रयास किया, लेकिन निरंकुश औरंगजेब नहीं माना। उसने गुरुजी के समक्ष इस्लाम स्वीकार करने, चमत्कार दिखाने या शहादत देने जैसी तीन शर्तें रखीं। मान्यता है कि सनातन धर्म में गहरी आस्था रखने वाले गुरुजी ने श्रीमद्भाग्वद् गीता के श्लोक का अनुसरण करते हुए आततायी औरगंजेब से कहा कि हमारा सनातन धर्म तो लोक-परलोक दोनों में सुख देने वाला है। दूसरा कोई धर्म इसकी समानता भी नहीं कर सकता। इसलिए हम भला अपने प्रिय धर्म को कैसे त्याग सकते हैं। जो पामर हैं, वही इसे त्यागने की बात सोच भी सकते हैं... और चमत्कार दिखाना ईश्वर की इच्छा की अवहेलना होगी। इसलिए शहादत देने वाली जो तुम्हारी तीसरी शर्त है, वही हमें स्वीकार है। हम शरीर पर प्रहार सहते हुए अपने प्राणों की आहुति देकर वैदिक सनातन धर्म की रक्षा करेंगे।

गुरुजी की धरोहर

उल्लेखनीय है कि जिस स्थान पर आसुरी प्रवृति वाले औरंगजेब के क्रूर जल्लादों ने अमर बलिदानी, पूज्य गुरुजी का शीश काटा था, वह स्थान आज भी मौजूद है और दिल्ली में गुरुद्वारा ‘शीशगंज’ के नाम से जाना जाता है। सच कहा जाये तो गुरुजी का त्याग, आत्म-बलिदान, उनकी शिक्षाएं आदि समेत इनका संपूर्ण जीवन ही हमारी सांस्कृतिक थाती है। हमारी धरोहर है, भारतीयता की पहचान है।

आदर्श जीवन का रास्ता

हमें गर्व होना चाहिए कि हमारी मातृभूमि ‘भारत माता’ हजारों वर्षों से ऐसे ही वीर पुत्रों के त्याग, स्वधर्म-निष्ठा और आत्म-बलिदान से सुवासित एवं उर्जस्वित रही है। हमें पूज्य गुरुजी का संदेश नहीं भूलना चाहिए कि धर्म मजहब नहीं, बल्कि कर्तव्य है, और आदर्श जीवन का रास्ता।

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