राजस्थान के सीकर जिले स्थित खाटू श्याम धाम में इस समय फाल्गुनी लक्खी मेला धूमधाम से मनाया जा रहा है, जो 28 फरवरी तक चलेगा। महाभारत के वीर बर्बरीक के त्याग की याद में हर साल आयोजित होने वाला यह मेला लाखों भक्तों को आकर्षित करता है। यहां की धार्मिक परंपराएं, बर्बरीक का शीश और श्याम कुंड की महिमा, भक्तों के लिए आस्था और भक्ति का केंद्र बने हुए हैं।
‘हारे का सहारा खाटू श्याम हमारा’, ‘खाटू नरेश की जय’, ‘लखदातार’ जैसे जयकारों का जयघोष, राजस्थान के सीकर जिले के श्री खाटू श्याम धाम में इन दिनों 28 फरवरी तक चल रहे फाल्गुनी लक्खी मेले के दौरान अधिक गूंज उठा है। महाभारत काल में, श्रीकृष्ण के एक आग्रह पर, अपना शीश दान करने वाले महादानी वीर बर्बरीक के अटूट त्याग की स्मृति में खाटू धाम में हर साल ‘लक्खी मेले’ का आगाज होता है। मेले में लाखों लोग रोज दर्शन करने आते हैं, उनके दुख- दर्द तर जाते हैं, इसलिए मेले को राजस्थानी अंदाज में ‘लक्खी’ और श्री खाटू श्याम को ‘लखदातार’ कहा जाता है। इस बार भी 8 दिवसीय मेले में, भक्तों की काफी संख्या आने की संभावना है।
370 साल पुरानी परंपरा
करीब 370 सालों से खाटू श्याम लक्खी मेले का आयोजन हो रहा है। मेले की शुरुआत श्री श्याम बाबा के शीश के प्रकट दिवस पर की गई थी। कहा जाता है कि उसी दिन फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को श्याम कुंड में बर्बरीक का शीश प्रकट हुआ था। इसके बाद अगले दिन द्वादशी को उसी शीश की स्थापना मंदिर रूप में की गई। तब से यह परंपरा निरंतर जारी है।
बर्बरीक के बलिदान की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, महाबली भीम के पोत्र बर्बरीक के पास भगवान शिव और अग्निदेव के दिए तीन बाण थे। वह भीम के पुत्र घटोत्कच और नाग कन्या अहिलवती के पुत्र थे। वह इन बाणों से तीनों लोक को नष्ट कर सकते थे। बर्बरीक वह बाण लेकर महाभारत के युद्ध में जा पहुंचे। इसीलिए वह ‘तीन बाण धारी’ भी कहलाए। बर्बरीक ने तीन बाणों से ही युद्ध समाप्त कर देने की बात कही। भगवान श्रीकृष्ण ने योद्धा की अपार शक्ति को पहचान लिया। चूंकि बर्बरीक ने प्रतिज्ञा ली थी कि वह युद्ध में जो पक्ष कमजोर पड़ेगा, उसी का साथ देंगे। इससे पांडवों की हार निश्चित थी। यानी बर्बरीक कौरवों की ओर से लड़ते, तो अधर्म की जीत होती, और धर्म हार जाता। श्रीकृष्ण का उद्देश्य धर्म की स्थापना करना था। अतः श्रीकृष्ण ने बर्बरीक के शीश की मांग की, ताकि वह युद्ध धर्म के पक्ष में रहे और पांडवों की विजय सुनिश्चित हो सके।
श्रीकृष्ण का बहाया शीश
श्रीकृष्ण के आदेश पर बर्बरीक का शीश श्यामकुंड में बहाया गया। यह वही स्थान है, जहां एक रोज गांववालों को बाबा श्याम का शीश मिला था। बाद में, इस शीश को चौहान वंश की नर्मदा कंवर को सौंप दिया गया, और 1084 विक्रम संवत में मंदिर की स्थापना की गई। देवउठनी एकादशी के दिन श्रीकृष्ण ने बर्बरीक को आशीर्वाद दिया कि ‘कलियुग में मेरे नाम से पूजे जाओगे।’ यही दिन था जब खाटू श्याम का मंदिर और इस क्षेत्र की पूजा परंपरा की नींव पड़ी।
बाबा श्याम के दर्शन
खाटू श्याम मंदिर में दर्शन के लिए भक्तों को 13 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। माना जाता है कि इन 13 सीढ़ियों को चढ़कर भक्त सीधे बाबा श्याम से नेत्र-संपर्क करते हैं, जिससे उनके दुख-दर्द दूर होते हैं। उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यह सीढ़ियां मंदिर निर्माण के समय से अस्तित्व में हैं और भक्तों में इनका एक विशेष धार्मिक महत्व है। यहां हाथ में मयूर पंख और डंडी वाला गुलाब का फूल भेंटस्वरूप ले जाना शुभ माना जाता है।
मंदिरों में पूजा
उधर बर्बरीक का धड़ हरियाणा के हिसार जिले के बीड़ गांव में स्थापित है। वहां ‘श्याम बाबा मंदिर’ है और इसी स्थान पर उन्होंने अपना शीश दान किया था। जबकि उनका शीश राजस्थान के रींगस में खाटू गांव में पूजनीय है, जिससे वे ‘खाटू श्याम’ कहलाए। इस प्रकार उनके शीश और धड़ की पूजा दूर-दूर अलग-अलग मंदिरों में होती है। जहां शीश दान किया गया, वह स्थान पानीपत के निकट चुलकाना धाम भी कहलाता है।
कैसे पहुंचें
श्री खाटू श्याम मंदिर राजस्थान के सीकर जिले में है। नज़दीकी रेलवे स्टेशन और बस अड्डा रींगस है। रींगस दिल्ली से करीब 300 किलोमीटर और जयपुर से लगभग 80 किलोमीटर दूर है। रींगस रेलवे स्टेशन से मंदिर करीब 15 किलोमीटर दूर ही है। भक्त ई-रिक्शा से जा सकते हैं। कुछ पैदल भी जाते हैं। आम दिनों में, दर्शन सुबह 6 से 11:30 बजे तक, फिर शाम 4:30 से रात 9:30 बजे तक होते हैं। आजकल लक्खी मेले के दौरान 24 घंटे मंदिर के द्वार खुले हैं।

