Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
search-icon-img
Advertisement

अज्ञान की रात्रि से ज्ञान के प्रभात की ओर

महाशिवरात्रि

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

इस पावन अवसर पर परमात्मा शिव समस्त आत्माओं को आह्वान करते हैं कि वे उन्हें पहचानें, अपने विकारों का त्याग करें और दैवी गुणों को अपनाकर नई दुनिया की स्थापना के इस महान कार्य में सहभागी बनें।

महाशिवरात्रि एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं सार्वभौमिक पर्व है। यह सृष्टि की समस्त मनुष्य आत्माओं के परमपिता, परमात्मा शिव के दिव्य अवतरण का स्मरणोत्सव है। यही कारण है कि यह पर्व अन्य सभी जन्मोत्सवों एवं जयंतियों की तुलना में विशिष्ट और सर्वोपरि माना गया है। परमपिता शिव का अवतरण कलियुग के अंतिम चरण में होता है, जब संपूर्ण मानव समाज विषय-विकारों की कालिमा में घिरकर अज्ञानता की गहरी निद्रा में सोया होता है। ऐसे समय में परमात्मा शिव मानव आत्माओं को जागृत करने, उन्हें पवित्रता, शांति और दिव्यता का मार्ग दिखाने के लिए अवतरित होते हैं। वे संपूर्ण सृष्टि के पिता हैं, इसलिए उनके दिव्य एवं कल्याणकारी कर्तव्य भी संपूर्ण विश्व के लिए होते हैं। नई पावन सृष्टि की स्थापना, उसका पालन तथा पुरानी पतित सृष्टि से बुराइयों का विनाश—इन तीन महान कर्तव्यों के माध्यम से वे मानव मात्र को गति और सद्गति प्रदान करते हैं।

आध्यात्मिक अर्थ

Advertisement

महाशिवरात्रि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की अंधेरी रात्रि को मनाई जाती है। यह रात्रि सृष्टि चक्र के अंत में व्याप्त अज्ञान, अपवित्रता और तमोगुण की प्रतीक मानी जाती है। ग्लोबल डिवाइन लाइट हाउस की राजयोगिनी टीचर बी.के. पूनम बहन का कहना है—‘महाशिवरात्रि में ‘रात्रि’ शब्द अज्ञानता का प्रतीक है। जब संसार काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार के अंधकार में डूब जाता है, तब परमात्मा शिव इस रात्रि में अवतरित होकर ज्ञान की ज्योति प्रज्वलित करते हैं। यही कारण है कि उनके अवतरण दिवस को महाशिवरात्रि कहा जाता है।’ सृष्टि चक्र के अनुसार सतयुग और त्रेता युग को ब्रह्मा का दिन तथा द्वापर और कलियुग को ब्रह्मा की रात्रि कहा गया है। इस दृष्टि से कलियुग दिन होते हुए भी अज्ञान की रात्रि के समान है।

Advertisement

शिवरात्रि रहस्य

देशभर में शिवरात्रि श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई जाती है। शिव मंदिरों में शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा, भांग और अक के फूल अर्पित किए जाते हैं तथा उपवास और रात्रि जागरण किया जाता है। इन रस्मों का गहरा आध्यात्मिक अर्थ है। शिवरात्रि की पूजा हमें यह संदेश देती है कि हम अपने भीतर के अवगुणों को परमात्मा के चरणों में अर्पित कर दें और उनके दिव्य गुण—शांति, प्रेम, आनंद और पवित्रता—को अपने जीवन में धारण करें।

‘शिव’ का महत्व

परमात्मा शिव ज्योति स्वरूप, स्वयंभू एवं शाश्वत हैं। उनका अवतरण होता है। वे सत‌्-चित‌‌्-आनंद स्वरूप हैं और जीवन-मरण के चक्र से परे हैं। कलियुग की अंतिम वेला में वे साधारण मानव तन में प्रवेश कर मानव आत्माओं को ज्ञान और राजयोग की शिक्षा देकर उनके दृष्टिकोण और जीवन को श्रेष्ठ बनाते हैं।

स्वर्णिम प्रभात का संदेश

महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सृष्टि परिवर्तन का शुभ संकेत है। यह अज्ञान की रात्रि के अंत और स्वर्णिम प्रभात के आगमन का उद्घोष करती है। जैसे वसंत ऋतु में प्रकृति नवजीवन से भर उठती है, वैसे ही यह पर्व नई पावन सृष्टि की स्थापना का संदेश देता है।

ईश्वरीय निमंत्रण

इस पावन अवसर पर परमात्मा शिव समस्त आत्माओं को आह्वान करते हैं कि वे उन्हें पहचानें, अपने विकारों का त्याग करें और दैवी गुणों को अपनाकर नई दुनिया की स्थापना के इस महान कार्य में सहभागी बनें। ‘महाशिवरात्रि का संदेश है—‘अभी नहीं तो कभी नहीं’। इस समय परमात्मा से बुद्धियोग जोड़कर ही हम अपने जीवन को वास्तव में धन्य बना सकते हैं।’ महाशिवरात्रि मानव आत्मा और परमात्मा के मिलन का वह दिव्य पर्व है, जो दुःख और अशांति से भरी इस दुनिया को सुख, शांति और आनंद की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करता है।

Advertisement
×