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श्रीकृष्ण के महाप्रस्थान से कलियुग तक

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा

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चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का दिन भारतीय नववर्ष और युग परिवर्तन का प्रतीक है। इस दिन द्वापर युग समाप्त होकर कलियुग का आरंभ हुआ। श्रीकृष्ण के महाप्रस्थान और सृष्टि के नवसृजन के साथ वैदिक कालगणना की शुरुआत हुई। विक्रमी संवत इसी पावन दिन से स्थापित हुआ।

विक्रमी संवत 3045 वर्ष पूर्व अर्थात‌् 5127 साल पहले चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा का वह दिन जब युग अपना स्वरूप और नाम बदल रहा था। काल के गाल में समाते हुए द्वापर से नए युग का आगाज हो रहा था। यह वही समय था जब सागर किनारे की एक सभ्यता समुद्र में हिचकोले खा रही थी। समुद्र में उठ रही ऊंची लहरंे एक सौंदर्य से पूर्ण नगरी को लील रही थी। अपने पन्ने पलटता हुआ इतिहास नए पृष्ठ पर हस्ताक्षर कर रहा था।

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कलियुग का आगमन

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सृष्टि रचना के 1,96,08,48000 वर्ष पूर्ण हो चुके थे। सातवें मन्वन्तर की 28वीं चतुर्युगी के द्वापर युग का अंत हो रहा था। उगते सूर्य की किरणें नए युग के आगमन का स्वागत कर रही थी। इसी को वर्तमान कलियुग के नाम से जानते हैं। कलियुग के वर्तमान काल तक 5127 वर्ष बीत चुके हैं। अनेक अव्यवस्थाओं के कारण हम अपनी जिस प्राचीन काल गणना को भूल चुके हैं, उसे पुनः स्मरण करने की आवश्यकता का अनुभव हो रहा है।

सृष्टि की आयु

मनुस्मृति के अनुसार सृष्टि की कुल आयु 4 अरब 32 करोड़ वर्ष है। इसे एक ब्रह्म दिवस कहते हैं, जिसमें एक हजार चतुर्युगी होती है। अर्थात‌् सृष्टि के आरम्भ से अंत तक सभी चारों युग एक-एक हजार बार आते हैं। इनको 14 मन्वन्तर में विभक्त किया गया है। इतने ही समय तक प्रलयकाल रहता है। इन दोनों की अवधि के योग कोे अहोरात्र कहा जाता है। ऐसे तीस अहोरात्रों को अहोमास, बारह अहोमास का अहोवर्ष तथा 100 वर्षों की गणना प्रान्तकाल कहलाती हैं।

श्रीकृष्ण का महाप्रस्थान

सृष्टि के 1,96,08,48000 वर्ष पूर्ण होने पर द्वापर और कलियुग का संध्याकाल था। भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र, पौत्र सहित यादवों का अवसान हो चुका था। उनके बड़े भाई बलराम चिर समाधि के लिए वन चल गए थे। वहां पहुंचकर श्रीकृष्ण ने उन्हें योग मुद्रा में अन्तिम हिजकी द्वारा प्राणों को त्यागते हुए देखा।

यह देखकर श्रीकृष्ण वन विहार करने लगे। अपने अन्तिम समय को निकट देखते हुए वह योगस्थ हो पीपल के पेड़ के नीचे लेट गए। इसी बीच एक बहेलिए ने किसी जानवर को निशाना बनाते हुए बाण छोड़ दिया। यह बाण श्रीकृष्ण के पांव के तलवे में जा लगा। इससे उनकी योगनिद्रा भंग हुई तो सामने बहेलिए को हाथ-जोड़े कांपते हुए देखा। इस पर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अभ्यदान देते हुए वहां से जाने को कहा और अपनी समस्त इंद्रियों तथा प्राणों को सिंकोड़कर ब्रह्मलोक को प्रस्थान कर गए। वह काल चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के दोपहर 2 बजकर 27 मिनट 31 सेकिंड का था। जैसे ही भगवान श्रीकृष्ण ने धरा का त्याग किया, वैसे ही द्वापर काल ने कलियुग में प्रवेश कर लिया।

नवऋतु, नवयुग, नवरात्र

युग परिवर्तन के साथ ही संवत और ऋतु बदल जाते हैं। इस कारण ऋषियों ने सभी त्योहारों को मनाने की व्यवस्था को ऋतु आधारित बनाया है। सनातन वैदिक धर्म में चैत्र और आश्विन माह के शुक्ल पक्ष में नवरात्र मनाए जाते हैं। इन दिनों मौसम समावस्था में होने के कारण गर्मी या सर्दी भी सम अवस्था में रहती हैं। प्रकृति अपना स्वरूप बदल रही होती है। इस कालखंड को नवरात्र कहा जाता है। नवरात्रों में विभिन्न यज्ञों के आयोजन करने की व्यवस्था दी है। नव दिनों तक 9 प्रकार के यज्ञ करते हुए दुर्गा अर्थात‌् प्रकृति माता के नवरूपों को स्पंदित किया जाता है।

संवत्सर ही विक्रमी संवत

यह वही समय है जब ईश्वर ने सृष्टि रचना का कार्य आरम्भ किया और युगों एवं वर्षों की शुरुआत हुई थी। दक्षिण भारत में इसे ‘उगादी’ अर्थात‌् युगादी के नाम से जाना जाता है। यह दिन भारतीय नववर्ष के रूप में मनाया जाता है। अतः वैदिक सनातन धर्म के अनुसार युग एवं काल गणना इसी नए संवत्सर के आरम्भ से होती है। भगवान श्रीकृष्ण के देहावसान के उपरान्त लगभग अढ़ाई हजार वर्ष तक देश में ठीक चलता रहा। उसके पश्चात अनेक विधर्मियों तथा विदेशी आक्रांताओं ने भारतीय संस्कृति को गंदला कर दिया। परन्तु 2083 वर्ष पहले भारत भूमि को आर्य शिरोमणी सम्राट विक्रमादित्य ने संवारने और सत्य सनातन वैदिक संस्कृति के पुनरुद्धार का प्रयास किया। शकों पर विजय प्राप्त कर उन्होंने इसी दिन चक्रवर्ती सम्राट का पद ग्रहण किया था। अतः यह संवत विक्रमादित्य के नाम अर्थात विक्रमी संवत से जाना जाने लगा।

सम्राट युधिष्ठिर ने भी इसी दिन हस्तिनापुर का साम्राज्य ग्रहण किया था। महर्षि दयानन्द ने आर्य समाज की स्थापना इसी दिन की थी। इस वर्ष यह संवत‍् 19 मार्च, 2026 को आरम्भ हो रहा है, जो ईसा से 57 वर्ष पहले होता है। इसी आधार पर भारतीय पंचाग भी तैयार किया जाता है। अतः हमें अपनी संस्कृति पर गर्व करना चाहिए।

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