आस्था-अनास्था और मानव कल्याण : The Dainik Tribune

आस्था-अनास्था और मानव कल्याण

आस्था-अनास्था और मानव कल्याण

डॉ. नरेश

यदि आप भगवान को नहीं मानते तो मेरा आग्रह है कि मान लें। मैं यह आग्रह आपको आस्तिक बनाने के उद्देश्य से नहीं कर रहा हूं, आपके जीवन की जटिलताएं कम करने के उद्देश्य से कर रहा हूं। आप अपने घर में एक खूंटी गाड़ लें। घर में खूंटी गड़ी होगी तो बहुत कुछ व्यवस्थित रहेगा। आप अपना कपड़ा, टोपी, छड़ी सब इसी खूंटी पर टांगते रहेंगे तो आवश्यकता पड़ने पर कोई चीज़ ढूंढ़नी नहीं पड़ेगी कि कहां रख बैठे।

इसी प्रकार की एक खूंटी आप अपने मन में गाड़ लें। उसका नाम भगवान रख लें। इस खूंटी पर अपने दुःख, अपनी चिन्ताएं, अपनी परेशानियां टांगते रहिए ताकि बहुत देर तक उनका बोझा आपको न ढोना पड़े अन्यथा बोझा ढोते-ढोते थक जाएंगे आप। अपने सुख भी टांगते रहिए इसी खूंटी पर क्योंकि ज्यादा देर तक सुख को ढोना भी उबाऊ हो जाता है।

जो बात आपको बहुत परेशान कर रही है, जिस बात की चिन्ता आपको खाए जा रही है, उसे जब आप मन में गड़ी भगवान नाम की खूंटी पर टांग देंगे तो उसका बोझ आपके सिर पर से उतर जाएगा। ऐसा करते समय जो भाव आपके भीतर जागेगा, वह यह होगा कि इस समस्या को सुलझाना अपने बस का तो नहीं है, देखें यदि ईश्वर इसको सुलझा दे। मुझे जितना दिमाग खपाना था, मैं खपा चुका, अब ईश्वर की इच्छा होगी तो काम बन जाएगा अन्यथा नहीं बनेगा। आपका ईश्वर पर विश्वास नहीं है लेकिन आपने मन में उसके नाम की खूंटी गाड़कर उसका अस्तित्व बना लिया है। यह अस्तित्व आस्तिकों जैसी श्रद्धा का केन्द्र बने, न बने, आपके दुःख स्थानान्तरित करता ही है।

व्यक्ति जब हार जाता है तो उसे अपनी हार के साथ समझौता करने में बहुत समय लगता है। श्रम भी बहुत करना पड़ता है स्थिति के साथ समझौता करने में। अचानक घर में मृत्यु हो जाती है। महीनों पछतावा लगा रहता है मन को कि यदि उन्हें तभी अस्पताल ले गए होते जब नाक में से जरा-सा खून निकला था या जब रात में पसीने से सराबोर जागे थे, तो शायद उनकी बीमारी तभी पकड़ आ गई होती। तभी ढंग से इलाज करा लिया होता इत्यादि-इत्यादि। इस स्थिति में या इस प्रकार की अन्य स्थितियों में करना व्यक्ति को समझौता ही होता है। आस्तिक व्यक्ति मृत्यु को भगवान की इच्छा मानकर जल्दी से स्थिति के साथ समझौता कर लेता है जबकि नास्तिक व्यक्ति महीनों, कई बार वर्षों, इसके साथ जूझता रहता है। व्यक्ति आस्तिक हो या नास्तिक अन्ततः उसको अपनी विवशता, अपनी पराजय को स्वीकार करना है कि वह किसी प्रकार भी मरने वाले को मरने से नहीं बचा सका और मरने के बाद किसी प्रकार से भी उसे जिन्दा नहीं कर सका। जो व्यक्ति इस विवशता को, इस पराजय को जितना जल्दी स्वीकार कर लेता है, वह उतना जल्दी मानसिक ऊहापोह से बाहर निकलकर अपनी ज़िन्दगी को उसके प्राकृतिक ढर्रे पर ले आता है।

अब अगर आप मानते हैं कि मन में गाड़ी हुई भगवान नाम की खूंटी आपके जीवन को सहज-सरल बनाने में सहायक सिद्ध हो रही है तो यह भी मान लें कि व्यक्ति जहां जाकर हारता है, वहीं से किसी दूसरी सत्ता के मौजूद होने का अहसास शुरू होता है। इस दूसरी सत्ता को आप कोई नाम न दें। भगवान, ईश्वर, गॉड, अल्लाह कुछ न कहें। बस सत्ता मान लें। सत्ता भी ऐसी जिसके सामने हर व्यक्ति की अपनी सत्ता छोटी पड़ जाती है। जिसके सामने हर व्यक्ति की सत्ता को एक न एक दिन धराशायी होना पड़ता है। उस सत्ता से बड़ी किसी अन्य सत्ता के होने की कल्पना ही नहीं कर सकते।

थोड़ा विचार करेंगे तो आप जानेंगे कि जिस सत्ता की काल्पनिक खूंटी आपने अपने मन में गाड़ रखी है, वह मात्र कल्पना नहीं है, वास्तविकता है। इसकी वास्तविकता के बोध में से ही एक अन्य अनुभूति निकलेगी कि जिसे मैं अपनी सत्ता मान रहा हूं. वह भी इस दूसरी या बड़ी सत्ता से भिन्न नहीं है।

यदि आपके भीतर की सत्ता और बाहर की अदृश्य-अलख सत्ता एक ही है तो आपको भीतर की सत्ता को जानने-पहचानने का प्रयत्न करना चाहिए। बाहर की सत्ता को जानना-समझना तो बाद की बात है, पहले यह जानना जरूरी है कि मैं क्या हूं, कौन हूं, कहां से आया हूं, कहां जाऊंगा, सृष्टि के इस विशाल-विस्तृत तामझाम में मेरी हैसियत क्या है, मेरे हाथ में क्या है इत्यादि-इत्यादि। यही सब जानने को आत्मज्ञान कहते हैं। आत्म ज्ञान ही ब्रह्मज्ञान का प्रथम चरण है।

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