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गलती और सच्चाई

एक बार प्रसिद्ध दार्शनिक और लेखक मॉन्तेन अपने बगीचे में टहल रहे थे। उन्होंने देखा एक छोटा-सा नौकर बहुत घबराकर भाग रहा है। पूछने पर पता चला कि उसने गलती से एक कांच का प्याला तोड़ दिया था और उसे...

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एक बार प्रसिद्ध दार्शनिक और लेखक मॉन्तेन अपने बगीचे में टहल रहे थे। उन्होंने देखा एक छोटा-सा नौकर बहुत घबराकर भाग रहा है। पूछने पर पता चला कि उसने गलती से एक कांच का प्याला तोड़ दिया था और उसे डर था कि मालिक डांटेंगे। मॉन्तेन ने उसे पास बुलाया और बोले, ‘डर क्यों रहे हो?’ लड़के ने कहा, ‘मैंने गलती कर दी... सज़ा मिलेगी।’ मॉन्तेन मुस्कुराए और बोले, ‘अगर हर गलती पर हम लोगों को इतना डराएं कि वे सच छुपाने लगें, तो गलती से बड़ी सच्चाई की हत्या हो जाएगी। मुझे प्याला नहीं चाहिए, मुझे यह चाहिए कि तुम सच्चाई बोलने में सुरक्षित महसूस करो।’ उन्होंने नौकर को दंड नहीं दिया बल्कि बाकी लोगों से कहा, ‘जहां सच बोलने पर सजा मिलती है, वहां झूठ पनपता है।’ धीरे-धीरे पूरे घर में यह आदत बन गई कि जब भी कोई गलती हो, लोग खुलकर बताते और उसी से सबक सीखते।

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