गुरुद्वारा हेमकुंट साहिब की पृष्ठभूमि में सात पर्वत चोटियां यानी सप्त शृंग शोभायमान हैं। साथ ही प्राकृतिक छटा, पवित्र सरोवर से निकलती 'हिम गंगा' की जलधारा है। शांति की अनुभूति से यहां पहुंचकर के शरीर में ऊर्जा का संचार हो जाता है।
अध्यात्म, प्रकृति और साहसिक पर्यटन का अद्भुत संगम श्री हेमकुंट साहिब गुरुद्वारा सभी धर्मों के अनुयायियों के लिए श्रद्धा का स्थल रहा है। समुद्र तल से 15200 फुट की ऊंचाई पर स्थित यह तपोभूमि सिख धर्मावलंबियों के लिए तो विशेष धार्मिक महत्व रखती है। यह गुरुद्वारा उत्तराखंड राज्य के चमोली जनपद में हिमालयी पर्वतमाला में स्थित है।
सबसे ऊंचा गुरुघर
दुनियाभर के गुरुघरों में सबसे ज्यादा ऊंचाई पर निर्मित इस गुरुघर की पृष्ठभूमि में सात पर्वत चोटियां (सप्त शृंग) शोभायमान हैं। साथ ही प्राकृतिक छटा, शांत पवित्र सरोवर, सरोवर से निकलती 'हिम गंगा' नामक पिघली चांदी सी चमकती जलधारा है। शांति की अनुभूति से इस देवस्थान पर पहुंचने वालों के शरीर में उत्साह और ऊर्जा का संचार हो जाता है। गुरुद्वारे की अनूठी वास्तुकला, तारे के आकार का डिज़ाइन और पवित्र सरोवर में झिलमिलाता पर्वत शिख़रों का अक्स हर साल हजारों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है।
दसवें गुरु के पूर्वजन्म से जुड़ी मान्यता
मान्यताओं के मुताबिक, सिख धर्म के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह ने अपने पूर्व जन्म में इसी नैसर्गिक स्थान पर गहन तपस्या कर ईश्वर से एकाकार स्थापित किया था तथा भारत भूमि को क्रूर शासकों के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के दायित्व निर्वहन हेतु वे दशम् गुरु के रूप में धरा पर भेजे गये। इस संबंध में प्रस्तुत हैं गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा लिखित महत्वपूर्ण ग्रंथ, 'दशम ग्रंथ' के ‘बचित्तर नाटक’ खण्ड से कुछ पंक्तियां :-
अब मैं अपनी कथा बखानो,
तप साधत जिहि बिध मुहि आनो!
हेमकुंट परबत है जहां,
सप्त सरिंग सोभित हैं तहां!
तहां हम अधिक तपसिआ साधी,
महाकाल कालिका अराधी!
तात मात गुरु अलख अराधा,
बहु बिधि जोग साधना साधा!
तिन जो करि अलख की सेवा,
ता ते भये परसनि गुर देवा!
तिन प्रभु जब आइस मुहि दीया,
तब हम जनम कलू महि लीया!
लक्ष्मण जी का मंदिर
हेमकुंट साहिब गुरुद्वारा के पार्श्व में शेषनाग अवतार लक्ष्मण जी का मंदिर भी सुशोभित है। इसके अलावा मान्यता है कि यहां पांडू राजा ने भी योग साधना की थी। एक मान्यता के मुताबिक, यह स्थान दशम गुरु के पिछले अवतार महापराक्रमी दुष्टदमन से भी जुड़ा है।
प्राकृतिक सौंदर्य व धार्मिक स्थल
हेमकुंट साहिब गुरुद्वारा परिसर तक पहुंचने के मार्ग में प्राकृतिक सौंदर्य और धार्मिक स्थानों की अद्वितीय शृंखला यात्रा की कठिनाइयों को भुलाती चलती है। ऋषिकेश इस यात्रा का प्रारंभिक स्थल है। यहीं पर हेमकुंट और बद्रीनाथ धाम की यात्रा के लिए पंजीकरण होता है।
यात्रा के विभिन्न पड़ाव
ऋषिकेश से देवप्रयाग, रूद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, नंदप्रयाग और विष्णुप्रयाग होते हुए सड़क मार्ग से गाड़ियां आपको गोबिंद घाट तक पहुंचाती हैं। गोबिंदघाट इस यात्रा का आधार शिविर है। रात्रि विश्राम के बाद यहां से तेरह किलोमीटर की ट्रैकिंग के बाद यात्री गोबिंदधाम पहुंचते हैं। तेरह किलोमीटर की यह चढ़ाई पैदल, घोड़ों, पालकी या हेलिकॉप्टर से कर सकते हैं।
रात्रि ठहराव उपरांत मुश्किल चढ़ाई
गोबिंदधाम में रात्रि ठहराव के बाद गुरुद्वारा हेमकुंट साहिब तक की खड़ी (स्टीप) चढ़ाई अपेक्षाकृत कठिन है लेकिन इस चढ़ाई वाले हिस्से की यात्रा के दौरान श्रद्धालु प्राकृतिक सौंदर्य और श्रद्धा के पाश में बंधे शनै-शनै आगे बढ़ते हैं तो अपने श्रम व श्रद्धा से गुरुघर और वहां अवस्थित आध्यात्मिक शक्ति को अर्घ्य अर्पित करते चलते हैं।
ठहरने की व्यवस्था
यात्रा के दौरान रास्ते में जितने भी गुरुद्वारे पड़ते हैं, सभी में सब जाति, धर्म और संप्रदाय के लोगों का समान रूप से स्वागत होता है तथा सबके लिए नि:शुल्क लंगर की व्यवस्था है। गुरुद्वारों और यात्रा शिविरों में ठहरने की नि:शुल्क और सशुल्क (रियायती दरों पर) दोनों तरह की व्यवस्था है।

