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शिक्षा और समर्पण

एकदा

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छात्र जीवन में जब डॉ. भीमराव अंबेडकर अमेरिका में पढ़ाई कर रहे थे, वे रोज सबसे पहले लाइब्रेरी पहुंचते और उसके बंद होने तक लगातार पढ़ते रहते थे। उनकी इस आदत को देखकर लाइब्रेरी का एक कर्मचारी बहुत प्रभावित हुआ। एक दिन उसने उनसे पूछा, ‘आपकी उम्र के लोग पढ़ाई के साथ-साथ मौज-मस्ती भी करते हैं, लेकिन आप हमेशा पढ़ते ही रहते हैं—ऐसा क्यों?’ अंबेडकर जी ने शांत भाव से उत्तर दिया, ‘मेरे जीवन में एक बड़ा लक्ष्य है। मैं केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए पढ़ रहा हूं। मुझे शिक्षा के माध्यम से बहुत कुछ बदलना है।’ यह सुनकर कर्मचारी आश्चर्यचकित रह गया और उनकी लगन की प्रशंसा करने लगा।

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