उभरते हुए लेखकों को प्रोत्साहित करने के लिए पंजाबी कवयित्री अमृता प्रीतम ने 1966 में अपने रंगकर्मी साथी इमरोज के साथ मिलकर ‘नागमणि’ नामक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। पाठकों से प्राप्त चंदे में खुद का कमाया धन मिलाकर उन्होंने 33 साल तक इस पत्रिका को नियमित रूप से निकाला। बाद में, अमृता जी की अस्वस्थता के चलते जब पत्रिका का प्रकाशन बंद करना पड़ा तो जिस पाठक का जितना भी चंदा एडवांस में आया हुआ था, उसकी गणना करके उसे मनीऑर्डर भेजकर लौटा दिया गया। साथ ही पत्रिका प्रकाशित न कर पाने के लिए पाठकों से खेद भी व्यक्त किया गया। जब किसी ने पत्रिका का चंदा लौटाने बाबत सवाल उठाया तो अमृता जी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, ‘अगर हम किसी कारणवश पत्रिका का प्रकाशन नहीं कर पा रहे तो इसमें हमारे पाठकों की क्या गलती है? पाठकों ने तो इसी उम्मीद के साथ चंदा भेजा होगा न कि पत्रिका आगे भी छपती रहेगी। इसलिए नैतिकता का तकाजा यही है कि पाठकों से एडवांस में प्राप्त चंदा हम उन्हें बाइज्जत लौटा दें और वही मैंने किया है।’
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