भगवान विष्णु के वराह अवतार की पावन कथा धर्म की पुनर्स्थापना, पृथ्वी की रक्षा और अधर्म पर सत्य की विजय का प्रेरक संदेश देती है। वराह जयंती इसी दिव्य अवतार के स्मरण का पर्व है।
सनातन धर्म में भाद्रपद यानी भादो महीने के शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि को प्रत्येक वर्ष वराह जयंती का पर्व बड़े ही धूम-धाम से मनाया जाता है। इस बार वराह जयंती 13 सितंबर को है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीहरि विष्णु ने कुल 24 अवतारों में से अपना तीसरा अवतार सतयुग में इसी दिन वराह रूप में ग्रहण करने के बाद हिरण्याक्ष नामक दैत्य का वध किया था।
मान्यताओं के अनुसार, उससे पूर्व वे मत्स्य एवं कच्छप नामक जलचर के रूप में दो अवतार ग्रहण कर चुके थे, लेकिन अब तक उन्होंने धरती पर अपने चरण मनुष्य रूप में नहीं रखे थे। वहीं, अपने तीसरे यानी वराह अवतार में भगवान श्रीहरि विष्णु ने मानव का शरीर और वराह यानी शुकर अथवा सुअर का मुख धारण किया था।
उद्धारक देवता
भगवान श्रीहरि आधे शुकर एवं आधे मानव के रूप में अवतरित हुए और अपनी करुणा एवं कृपा का विस्तार करने के उद्देश्य से पहली बार धरती पर अपने पग रखे थे। तत्पश्चात उन्होंने इस धरा पर अपनी लीलाएं आरंभ की थीं। गौरतलब है कि हिरण्याक्ष नामक दैत्य का वध कर पृथ्वी का उद्वार करने के कारण भगवान श्रीहरि विष्णु के वराह अवतार को ‘उद्धारक देवता’ के रूप में भी जाना जाता है।
हिरण्याक्ष का वध
‘हिरण्य’ का अर्थ ‘स्वर्ण’ और ‘अक्ष’ का मतलब ‘आंख’ होता है, लेकिन यहां पर स्वर्ण ‘सोने’ का नहीं, बल्कि ‘धन-धान्य’ का प्रतीक है। इस प्रकार, देखा जाए तो ‘हिरण्याक्ष’ वह होता है, जिसकी नजर हमेशा दूसरों के धन पर लगी रहती हो। जाहिर है कि अपने नाम के अनुरूप ही हिरण्याक्ष बेहद असंयमित, असंतोषी एवं दूसरों के धन-धान्य पर हमेशा आंखें गड़ाये रखने वाला दैत्य था। उसकी लालसा का विस्तार इतना अधिक हो चुका था कि वह ब्रह्मदेव द्वारा रची गयी संपूर्ण सृष्टि पर ही नहीं, बल्कि तीनों लोकों में अपना आधिपत्य स्थापित कर लेना चाहता था। उसने अपनी लालसा को पूरी करने के लिए इंद्रादि देवताओं से भयंकर युद्ध कर उन्हें पराजित करने के बाद न केवल स्वर्ग पर, बल्कि पृथ्वी पर भी आधिपत्य स्थापित कर लिया था। तत्पश्चात वराह रूपी भगवान श्रीहरि विष्णु ने हिरण्याक्ष का वध करके संपूर्ण पृथ्वी की रक्षा की थी।
मनोवांछित फल की प्राप्ति
हिरण्याक्ष वध के बाद से ही भगवान श्रीविष्णु के इस स्वरूप की प्रत्येक वर्ष पूजा की जाती है। माना जाता है कि भगवान श्रीविष्णु ने वराह रूपी यह कल्याणकारी अवतार बुरी एवं नकारात्मक शक्तियों का नाश करने के लिए लिया था। इसलिए इस दिन निर्मल मन और लगन से और श्रद्धापूर्वक उनकी पूजा-आराधना करने वाले मनुष्य की सभी भूलों और पापों का नाश हो जाता है।
मंदिरों में विशेष पूजा
केरल के तिरुमाला में स्थित ‘भुवराह स्वामी मंदिर’ ऐसा ही एक मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण 16वीं शताब्दी में हुआ माना जाता है। वराह जयंती के अवसर पर इस मंदिर में नारियल के पानी से स्नान कराने के बाद भगवान वराह की मूर्ति की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। 11वीं शताब्दी में निर्मित ऐसा ही एक और पुराना मंदिर मध्य प्रदेश के छतरपुर क्षेत्र में भी स्थित है। यह ‘वराह मंदिर खजुराहो’ के नाम से प्रसिद्ध है। वराह जयंती पर यहां भव्य आयोजन किया जाता है।
इसी प्रकार मथुरा में भी भगवान वराह का एक बहुत पुराना मंदिर है, जहां वराह जयन्ती अत्यधिक भव्य रूप से मनायी जाती है।

