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लगन से बुलंदी

एकदा

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लगन से बुलंदी

सोवियत रूस में रहने वाले उस बच्चे को पढ़ने-लिखने का बहुत शौक था। बचपन में माता-पिता का साया अपने सिर से उठ जाने के बाद जब बूढ़ी दादी के भरण-पोषण की जिम्मेवारी उस पर आन पड़ी। उसने पढ़ाई बीच में छोड़कर एक कबाड़ी के यहां नौकरी करनी शुरू कर दी। इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी पढ़ने की उसकी इच्छा खत्म नहीं हुई। कबाड़ी के यहां रद्दी में तुलकर आने वाली किताबों को पढ़-पढ़कर उसने अपना ज्ञान बढ़ाना जारी रखा। पुस्तक में लिखी कोई बात समझ न आने पर वह कबाड़ी से या फिर अपने वहां आने वाले ग्राहकों से उसका मतलब पूछ लेता था। फिर एक दिन ऐसा आया कि अपने विचारों को लिखकर उसने स्थानीय अखबारों को भेजना शुरू किया तो उसके विचार छपने भी लगे। संपादकों से प्रोत्साहन पाकर उसके हौसले इतने बुलंद हुए कि कालांतर में वह मैक्सिम गोर्की नामक लेखक के रूप में पूरे विश्व में प्रसिद्ध हुआ। विश्व को ‘मां’ जैसे कालजयी उपन्यास का तोहफा मैक्सिम गोर्की ने ही दिया था।

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