एकदा

निहारने की गुरुभक्ति

निहारने की गुरुभक्ति

बात उस समय की है जब स्वामी विवेकानंद, स्वामी विवेकानंद नहीं बल्कि नरेंद्र दत्त थे और अपने गुरु के लिए नरेन थे। नरेन अपने गुरुदेव से मिलने रोजाना उनके पास दक्षिणेश्वर आया करते थे। एक बार गुरुदेव रामकृष्ण ने नरेन से बात करना और उनकी ओर देखना भी बंद कर दिया। स्वामी विवेकानंद (नरेन) थोड़ी देर बैठे रहे, फिर गुरुदेव रामकृष्ण परमहंस को प्रणाम करके चले गए। जब अगले दिन आये तब फिर वही घटना घटी, फिर एेसा कई दिनों तक चलता रहा। आखिर में रामकृष्ण परम हंस ने अपनी चुप्पी तोड़ी और स्वामी विवेकानंद से पूछा। जब मैं तुझसे बात ही नहीं करता था, तो तू क्या करने यहां आता रहा। उत्तर में स्वामी विवेकानंद बोले, ‘महाराज आपको जो करना है आप जानें, मैं कोई आपसे बात करने ही थोड़ी आता हूं... मैं तो बस आपको देखने के लिए आता हूं।’ स्वामी विवेकानंद गुरु को देख-देख कर पूर्णता की ओर बढ़ गये। जीवन में जिसने गुरु को निहारने की कला सीख ली वह हमेशा आगे बढ़ता ही जाता है और अपार आनंद प्राप्त करता है।

प्रस्तुति : अक्षिता तिवारी

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