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भक्ति और त्याग

एकदा

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एक राजा ने संत तुकाराम की ख्याति सुनी तो उन्होंने अपने एक मंत्री को उन्हें बुलाने के लिए उनके घर भेजा। मंत्री ने संत तुकाराम से साथ चलने की प्रार्थना की तो वे विनम्रतापूर्वक बोले, ‘मैं यहां बैठा-बैठा राजा की सफलता की कामना करता हूं। राजदरबार में जाने पर मुझे भगवान की सेवा से विमुख होना पड़ेगा; इसलिए मैं आपके साथ चलने में असमर्थ हूं।’ राजा ने जब संत तुकाराम की निस्पृहता के बारे में सुना तो वे स्वयं ही उनके दर्शन के लिए पहुंचे। वहां पहुंचकर उन्होंने संत तुकाराम के चरण स्पर्श किए तथा स्वर्ण मुद्राओं से भरी एक थैली उनके चरणों में अर्पित कर दी। संत तुकाराम ने उस थैली को वापस करते हुए कहा, ‘महाराज! माया ही तो भक्ति में बाधक बनती है। प्रभु विट्ठल की कृपा से मुझे भोजन-वस्त्र और अन्य आवश्यक वस्तुएं सब कुछ मिल ही जाता है। मैं इस धन का क्या करूंगा? इसे आप किसी धर्मकार्य में लगा दीजिए।’ राजा उनकी वीतरागता देखकर नतमस्तक हो उठे।

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