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सीमांत इलाकों में लोगों के दिलों में धड़कते सांस्कृतिक-धार्मिक रिश्ते

उत्तराखंड–हिमाचल की सांस्कृतिक यात्रा

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उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के सीमांत गांवों की सदियों पुरानी परंपराएं आज भी जीवंत हैं। चिटकुल और मुखबा जैसे गांवों के बीच गहरे सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध इन क्षेत्रों को एक सूत्र में बांधे हुए हैं। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद यहां की मालाएं, वस्त्र और रीति-रिवाज पारंपरिक आत्मीयता और आस्था की अनूठी मिसाल पेश करते हैं।

उत्तराखंड और हिमाचल के सीमांत गांवों की सदियों पुरानी परंपराएं बदलते सामाजिक परिवेश के बावजूद आज भी जीवंत हैं। धार्मिक आयोजन हों या पारंपरिक रीति-रिवाजों का निर्वहन, दोनों राज्यों के सीमांत क्षेत्र के लोग अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित परंपराओं को पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ निभा रहे हैं।

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रिश्तों की आत्मीयता

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हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले में सतलुज नदी के किनारे बसे चिटकुल गांव और उत्तरकाशी जनपद के सीमांत गांवों के बीच भले ही भौगोलिक दूरी हो, लेकिन रिश्तों की आत्मीयता आज भी कायम है। सदियों पुराने सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध आज भी दोनों क्षेत्रों को एक सूत्र में बांधे हुए हैं।

चिटकुल के निवासी कठिन पर्वतीय रास्तों को पार कर पैदल गंगोत्री और मां गंगा के शीतकालीन पूजा स्थल मुखवा की यात्रा करते हैं। यह परंपरा केवल आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि सीमांत क्षेत्रों के बीच सदियों से चले आ रहे सांस्कृतिक जुड़ाव और भाईचारे की भी जीवंत मिसाल है।

अतिथि सत्कार और माला परंपरा

यहां के रिश्तों की पहचान मालाओं से होती है। दो तरह की माला अतिथियों को पहनाई जाती है। एक शिरोल की माला होती है, जो अखरोट और सूखे बादामों की बनी होती है। दूसरी माला रुपये की होती है। यदि कोई नजदीकी रिश्तेदार है, तो उसे शिरोल की माला पहनाई जाती है। अन्य को रुपयों की माला पहनाकर उसका सम्मान किया जाता है।

शिरोल की माला : इसे ‘शिरो’ भी कहा जाता है। यह अखरोट, सूखे बादाम और कभी-कभी खुबानी (चिलगोजा) से बनी एक सुंदर और पौष्टिक माला होती है। यह मेहमानों को स्वास्थ्य और समृद्धि का आशीर्वाद देने का प्रतीक है।

रुपयों की माला : यह मेहमानों के प्रति सम्मान और आदर प्रकट करने का पारंपरिक तरीका है। इसमें नोटों (या सिक्कों) की माला बनाकर मेहमानों को पहनाई जाती है।

ऊन के वस्त्र पारंपरिक उपहार

अतिथियों को उन से बने वस्त्र भेंट स्वरूप दिए जाते हैं। हिमाचल में बनी टोपी के ऊपर एक खास तरह का फूल लगाया जाता है। इस फूल को चम्पका कहते हैं। यह फूल किन्नौर के अलावा उत्तराखंड के कुछ इलाकों में पाया जाता है। इसकी विशेषता यह है कि इसे कई सालों तक रखा जा सकता है।

सामाजिक और पारंपरिक आयोजन

उत्तरकाशी जिले के सीमांत गांव मुखबा निवासी और धार्मिक मामलों के जानकार बताते हैं कि मुखबा और आसपास के गांवों तथा किन्नौर जिले के चिटकुल गांव के बीच भले ही दूरी हो, लेकिन ग्रामीणों के रिश्ते बेहद करीब हैं। बदलते सामाजिक परिवेश में भी सदियों पूर्व की परंपराएं यहां जीवंत रूप में देखी जा सकती है।

वे बताते हैं कि विवाहिता के संतान प्राप्ति पर यहां खास कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। इसमें कन्या पक्ष के लोगों को आमंत्रित कर सम्मानित किए जाने की परंपरा है। बताते हैं यहां दो प्रकार की मालाएं पहनाई जाती है। एक शिरोल की माला और दूसरी रुपये की माला, अतिथियों को पहनाई जाती है। इसके अलावा ऊन से बने वस्त्र और आभूषण भी उपहार स्वरूप भेंट किये जाते हैं।

सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध

उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के कई सीमांत गांवों के बीच प्राचीन काल से देवी-देवताओं का आदान-प्रदान और मिलन होता रहा है। जैसे कि मुखबा (उत्तराखंड) और चिटकुल (हिमाचल प्रदेश) के बीच सदियों पुराना धार्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव है।

इसी प्रकार गंगोत्री धाम के कपाट बंद होने के बाद मां गंगा की डोली मुखबा गांव में प्रवास करती है। इसी तरह, किन्नौर घाटी में स्थित चिटकुल और गढ़वाल हिमालय के निवासियों के बीच मेल-मिलाप और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की परंपराएं इन दोनों क्षेत्रों को एक सूत्र में बांधती हैं।

समृद्ध विरासत

आधुनिकता के दौर में भी सीमांत गांवों के लोग अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक रिश्तों को जीवित रखे हुए हैं। यह हिमालयी लोक संस्कृति की समृद्ध विरासत और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है।

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