मानवीय मूल्यों और सर्वहारा वर्ग के लिए लिखने वाले रूसी उपन्यासकार मैक्सिम गोर्की ने ‘मां’ जैसा उपन्यास रचकर पूरे विश्व में नाम कमाया था। मुंशी प्रेमचंद उनकी बहुत इज्जत करते थे और उन्हें अपना आदर्श मानते थे। जून, 1936 में जब गोर्की का निधन हुआ, तो तपेदिक रोग से बुरी तरह ग्रस्त प्रेमचंद बेचैन हो उठे। रात भर जागकर उन्होंने गोर्की के सम्मान में एक शोक-प्रस्ताव लिखा, जो एक शोक-सभा में पढ़ा जाना था। पत्नी शिव रानी ने यह सब देखकर कहा, ‘गोर्की तो हिंदुस्तान के नहीं थे, फिर इतना परेशान क्यों हो रहे हो?’ इस पर प्रेमचंद बोले, ‘आम आदमी के सुख-दुख से सरोकार रखने वाले और उनके लिए लिखने वाले गोर्की सिर्फ रूस के ही नहीं, पूरी दुनिया के दुलारे थे। इस नाते यह तो बनता ही है कि हम 'अपने' गोर्की के लिए शोक-प्रस्ताव लिखें।’
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