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समय का फेर

एकदा

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एक बार गुरु सत्येन्द्रनाथ अपने शिष्यों को यह बता रहे थे कि जीवन में तीन चीज़ें बहुत उलझी हुई होती हैं—दिल, दिमाग और किस्मत। दिल कुछ चाहता है, फिर दिमाग उसे पाने के लिए रास्ता तलाश करता है, लेकिन अंत में वही होता है जो तक़दीर में लिखा होता है। सुबोध नामक एक युवक को यह बात समझ नहीं आ रही थी। गुरुजी उसे एक बगीचे में लेकर गए। वहां एक बंदर जामुन के पेड़ पर चढ़ाई करना चाहता था, लेकिन बागबान का मोटा डंडा उसे कुछ भी नहीं करने दे रहा था। बंदर ने एक-दो बार प्रयास किया, लेकिन वह असफल रहा। भूख बढ़ती जा रही थी। तभी, उस बगीचे में एक बुजुर्ग केले का गुच्छा लेकर आए और वह गुच्छा बंदर के सामने रख दिया। बंदर की खुशी का पारावार न था। उसने खुशी-खुशी हाथ आगे बढ़ाकर केले छीलने शुरू किए और गर्दन हिलाते हुए वह केले खाता रहा। यह दृश्य देखकर सुबोध ने गुरुजी की बात को समझ लिया और स्वीकार किया कि जीवन में जो होता है, वह तक़दीर ही तय करती है।

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