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देवी दर्शन से चंद्रमा ने पाया मुक्ति का आशीर्वाद

राकेश्वरी देवी

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हिमालय की गोद में बसा रांसी गांव धार्मिक और पौराणिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थल है। यहां स्थित राकेश्वरी देवी मंदिर चंद्रमा की मुक्ति, औषधीय घास और मध्यमहेश्वर धाम के निकट होने के कारण श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र है।

हिमालय की गोद में बसा रुद्रप्रयाग जनपद का रांसी गांव न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है। बल्कि यह धार्मिक और पौराणिक दृष्टि से भी खास महत्व रखता है। यह मध्यमहेश्वर धाम का मुख्य आधार स्थल है।

रांसी गांव, देश के एकमात्र राकेश्वरी देवी मंदिर के कारण श्रद्धालुओं के लिए विशेष पहचान रखता है। यह मध्यमहेश्वर घाटी के ग्रामीणों की आराध्य देवी हैं। राकेश्वरी को गढ़वाल राजाओं की कुलदेवी भी माना जाता है और यह चंद्र कल्याणी भगवती राकेश्वरी की तपस्थली है।

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पौराणिक महत्व

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ऐसी मान्यता है कि यही वह स्थान है। जहां चंद्रमा को देवताओं के गुरु बृहस्पति के श्राप से मुक्ति मिली थी। दरअसल चंद्रमा, बृहस्पति के श्राप से श्रापित हो गए थे, जिससे चन्द्रमा का शरीर कुष्ठ रोग से ग्रस्त हो गया। चन्द्रमां इस श्राप से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव के पास गये। भगवान शिव ने उनको हिमालय के इस स्थान पर भेजा। जहां देवी का स्थान था। चन्द्रमा ने कई वर्षों तक इस स्थान पर देवी की स्तुति की। देवी ने प्रसन्न होकर चन्द्रमा को दर्शन दिए। देवी के दर्शन से चन्द्र मां रोग मुक्त हो गए।

केदारनाथ और मध्य महेश्वर के वरिष्ठ पुजारी बताते हैं कि इस स्थान पर चंद्रमा ने मां जगदंबा का कई सालों तक तप और ध्यान किया। यहां से प्रेरणा लेकर वो सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए गए।

औषधीय घास

राकेश्वरी मंदिर परिसर में एक औषधीय गुणों से भरपूर और देवी शक्ति से परिपूर्ण प्राकृतिक घास है। इस घास को ना तो कोई काटता है और ना हथियार लगाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस घास में औषधीय तत्व हैं। जिससे रोगी का कुष्ठ रोग दूर हो जाता है। जनश्रुति है कि पूर्णिमा के दिन यदि कुष्ठ रोग से ग्रसित व्यक्ति गाय की तरह इस घास को चबा चबा कर खाए तो वह कुष्ठ रोग से मुक्त हो जाता है।

एकसाथ पूजा

यहां के पुजारी बताते हैं कि जब मध्यमहेश्वर मंदिर के कपाट ग्रीष्म काल के लिए खुलते और शीतकाल के लिए बंद होते हैं। उस दिन राकेश्वरी मंदिर में मध्यमहेश्वर और राकेश्वरी देवी दोनों की एक साथ पूजा की जाती है। यह पूजा मध्यमहेश्वर मंदिर के मुख्य पुजारी द्वारा की जाती है।

यह क्षेत्र मुक्ति प्रदान करने वाला है। इसलिए रांसी स्थित मंदिर में राकेश्वरी देवी के दर्शन का अपना अलग महत्व है।

वास्तुकला

राकेश्वरी मंदिर पत्थरों के चबूतरे पर तरासे हुए पाषाण खण्डों से बना है। मंदिर दो भागों से बना है। सभा मण्डप और गर्भगृह। गर्भगृह में काले पत्थर पर भगवान शिव व पार्वती की मूर्ति उकेरी गई है। मंदिर में अष्टधातु की चार मूर्तियां हैं। इन चारों मूर्तियों की अलग-अलग रूपों में पृथक-पृथक पूजा की जाती हैं। मंदिर के गर्भगृह में देववृक्ष से निर्मित काष्ठ पर मूर्तियों को सजाकर रखा गया है।

मंदिर तक मार्ग

यह मंदिर मध्यमहेश्वर धाम जाने वाले मार्ग में स्थित है। रुद्रप्रयाग से ऊखीमठ, मनसूना होते हुए सड़क मार्ग से रांसी स्थित राकेश्वरी मंदिर पहुंचा जाता है।

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