चैतन्य महाप्रभु ने अपने आराध्य भगवान श्रीकृष्ण की भांति ही अपने जीवन काल में अनेक अद्भुत लीलाएं रचीं, जिनका एकमात्र उद्देश्य भटकाव में जी रहे मनुष्य को उचित मार्ग दिखाकर उनका कल्याण सुनिश्चित करना था।
श्रीकृष्ण भक्ति-परंपरा के महान संत चैतन्य महाप्रभु का जन्म ईसा पूर्व 1486 (फाल्गुन पूर्णिमा) को पिता जगन्नाथ मिश्र एवं माता शची देवी के घर पश्चिम बंगाल के नादिया नगर के मायापुर नामक गांव में हुआ था। नीम के वृक्ष के नीचे जन्म होने के कारण माता-पिता ने उनका नाम ‘निमाई’ रखा। वहीं, गौर वर्णी होने के कारण वे गौरांग, गौर हरि एवं गौर सुंदर भी कहलाए।
श्रीकृष्ण भक्ति-परंपरा के आचार्य जगद्गुरु कृपालुजी महाराज ने भी गहन चिंतन-दर्शन को अपने कीर्तन में समाहित किया है-‘महाप्रभु चैतन्य हरि अवतारी, आपुना भक्ति करे आपु मुरारी।’ वे कहते हैं कि चैतन्य महाप्रभु श्रीकृष्ण के अवतार हैं, जो अपने ही भक्त के रूप में प्रकट हुए थे। चैतन्य महाप्रभु श्रीकृष्ण थे, जो राधारानी के दिव्य भावों का साकार रूप थे। श्री चैतन्य का रंग राधा रानी जैसा था और उनके शारीरिक गुण भगवान श्रीकृष्ण के समान थे। वे कृष्ण की दिव्य ऊर्जा हैं और उनका प्रेम भगवान को दिव्य आनंद प्रदान करता है।
तेजोमय एवं अलौकिक
श्री महाप्रभु के जीवन से जुड़ी अनेक कहानियां एवं घटनाएं उनकी जन्मजात तेजोमयता एवं अलौकिकता को सिद्ध करती हैं।
वैवाहिक जीवन
16 वर्ष की आयु में माता-पिता ने किशोर निमाई का विवाह लक्ष्मी देवी नामक स्त्री से करा दिया, लेकिन सर्पदंश के कारण लक्ष्मी देवी का शीघ्र ही देहान्त हो गया। हालांकि, बाद में निमाई की दूसरी शादी नवद्वीप की विष्णुप्रिया के साथ करा दी गयी, लेकिन इस बार वे ही पत्नी का साथ लंबे समय तक नहीं निभा पाये।
संन्यास ग्रहण
कथा के अनुसार पिता की मृत्यु के पश्चात उनका श्राद्ध-कर्म करने निमाई बोध गया गये। वहां उनकी भेंट एक बेहद प्रतिष्ठित वैष्णव संत ईश्वर पुरी जी से हुई, जिन्होंने निमाई के कान में श्रीकृष्ण भक्ति का मंत्र फूंक दिया। कहते हैं कि उस घटना के पश्चात युवा निमाई का जीवन ही बदल गया। भीतर से वैरागी होने के कारण निमाई का घर-गृहस्थी में मन नहीं लगा और महज 24 वर्ष की अवस्था में वे घर-बार त्याग कर सत्य एवं परमात्मा की तलाश में निकल गए। कालान्तर में एक अन्य वैष्णव संत केशव भारती जी से संन्यास ग्रहण करने के बाद वे चैतन्य महाप्रभु कहलाए।
हरिनाम संकीर्तन के प्रचारक
संन्यास ग्रहण करने के बाद चैतन्य महाप्रभु ने पदयात्रा करते हुए भारतवर्ष के कोने-कोने में जाकर श्री हरिनाम की महिमा और श्री हरिनाम संकीर्तन को जन-जन तक पहुंचाने का अनुपम कार्य किया। चैतन्य महाप्रभु ने श्री हरिनाम संकीर्तन की पावन रसधार बहाकर क्षुधित, पीड़ित एवं प्रताड़ित मानवता की प्रभु-प्रेम-पिपासा पूरी की। उन्होंने न केवल एक बार फिर मानव-समुदाय को प्रभु-प्रेम की अगाधता से परिचय कराया, बल्कि उसे अपने जीवन-काल में ही प्राप्त करने का मार्ग भी भक्तों को दिखलाया।
अद्भुत लीलाएं कीं
चैतन्य महाप्रभु ने अपने आराध्य भगवान श्रीकृष्ण की भांति ही अपने जीवन काल में अनेक अद्भुत लीलाएं रचीं, जिनका एकमात्र उद्देश्य भटकाव में जी रहे मनुष्य को उचित मार्ग दिखाकर उनका कल्याण सुनिश्चित करना था।
ईर्ष्या करने वाले भी शिष्य बने
चैतन्य महाप्रभु के संपर्क में जो भी आया, वह श्रीकृष्ण की भक्ति एवं अनुकम्पा से ओत-प्रोत हुए बिना नहीं रह सका। यहां तक कि उनकी अनुपमेय भक्ति एवं परमात्म-कृपा के कारण उनसे ईर्ष्या करने वाले भी अंततः उनका शिष्यत्व स्वीकार कर श्रीकृष्ण भक्ति में लीन होते गये। उनके समकालीन संतों अद्वैत वेदान्ती वासुदेव सार्वभौम जी एवं प्रकाशानंद सरस्वती जी भी उनका सान्निध्य पाकर श्रीकृष्ण प्रेमी बन गये।
श्रीमहाप्रभु ने षड्गोस्वामियों के रूप में जगत विख्यात अपने छह प्रमुख अनुयायियों गोपाल भट्ट गोस्वामी, रघुनाथ भट्ट गोस्वामी, रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी, जीव गोस्वामी एवं रघुनाथ दास गोस्वामी को वृन्दावन भेजकर पीड़ा, प्रकोप, प्रताड़ना, अहंकार, घृणा, भय, दुःख, निराशा, हताशा एवं उदासी इत्यादि में आकंठ डूब चुके जन-मानस के कल्याणार्थ एवं धर्म तथा संस्कृति के रक्षार्थ सप्त देवालयों की स्थापना करवाई थी। ये सभी सप्त देवालय वैष्णव मंदिर हैं, जो आज भी वृन्दावन की भूमि पर कदम रखने वाले भक्तों को नयनसुख और ताप-संताप से मुक्ति दिलाने का कार्य करते हैं।

