इसी तरह से अध्यात्म के मार्ग पर भी कुछ उपदेशक केवल कथा कर्म से करोड़ों कमाकर अपने को विद्वान और अध्यात्म के मार्ग का पथिक मान बैठे हैं। अध्यात्म का भी अपना बाजार बन गया है, जहां उपदेश से लेकर उपक्रम तक सब बिकने लगा है।
यात्रा शब्द ‘या’ और ‘त्रा’ के योग से बनता है। ‘या’ का अर्थ है जाना और ‘त्रा’ का अर्थ त्राण से है। अर्थात् त्राण के लिए जाना। त्राण यानी सुकून। त्राण यानी मोक्ष। अर्थात् किसी अभीष्ट सुकून की तरफ जाना यात्रा है। मोक्ष को भी समझने की आवश्यकता है— मोक्ष शब्द का कोई भारी-भरकम अर्थ लेने से पहले हमें इस शब्द के साधारण अर्थ समझने चाहिए जो इस तरह से हैं—मुक्ति, विमुक्ति, निर्वाण, कैवल्य, समाधि, स्वतंत्रता, पूर्णताया आनंद। ये सब ही अर्थ एक अंतिम छोर की तरफ इशारा करते हैं। अर्थात् किसी अंतिम लक्ष्य की ओर जाने की प्रक्रिया ही यात्रा है। एक ऐसा गमन जो किसी आनन्द की तरफ जाता हो, जो पूर्णता की तरफ जाता हो, जो स्वतंत्रता की तरफ जाता हो, मुक्ति या विमुक्ति की तरफ जाता हो।
मुक्ति, आनन्द, स्वतंत्रता यदि इन सब को लक्ष्य मान भी लिया जाए तो क्या इन शब्दों में सबके लिए एक जैसा अर्थ माना जा सकता है। रोगी के लिए रोग से मुक्ति ही बड़ा लक्ष्य हो सकता है। बंधक के लिए स्वतंत्रता ही यात्रा का बड़ा लक्ष्य हो सकता है, मुक्ति ही बड़ा लक्ष्य हो सकता है। किंतु हमें तो मोक्ष का अर्थ कुछ और समझ आता है। मोक्ष इस दुनिया में आने-जाने की यात्रा के अंत के रूप में शास्त्र वर्णित करते हैं, संत उपदेश भी ऐसा ही करते हैं कि हमारा अंतिम लक्ष्य मोक्ष ही है। मोक्ष अर्थात् आत्मा का जनम-मरण के चक्र से बाहर हो जाना। जब आत्मा जनम-मरण के चक्र से निकलकर उस परम पिता में स्वयं को विलीन कर लेती है तो शास्त्र उसे मोक्ष कहते हैं।
यदि हम आत्मा को एक इकाई मानें, ये मानें की हर आत्मा इस धरा धाम पर इस लिए ही आई है क्योंकि उसे अपनी स्वयं की यात्रा पूरी करनी है। अर्थात् उसे धरा धाम पर एक सफर तय करना है जो उसे उसके अंतिम लक्ष्य तक ले जाएगा, अर्थात् मोक्ष तक ले जाएगा तो फिर हमें कई अन्य बिंदुओं पर भी विचार करना पड़ेगा।
प्रश्न है कि क्या हर आत्मा को इस बात का भान है भी कि उसकी यात्रा का लक्ष्य क्या है? यदि इस धरा का हर जीव अपनी अपनी आत्मा के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए यात्रा कर रहा है तो ये एक धार्मिक यात्रा जैसा है। इसमें भला एक-दूसरे की यात्रा से एक-दूसरे का क्या ही बुरा होगा और क्या ही भला होगा। यदि सबकी यात्रा उसकी अपनी निजी के लिए है तो फिर इस धरती पर इतने सारे रिश्ते-नातों के झमेले क्यों हैं भला? क्यों व्यक्ति इतने सारे दुख-दर्द को झेलता रहता है। क्यों लोगों में इतना स्वार्थ जाग जाता है कि लोग अपने हितों के लिए दूसरों की राह में अवरोध पैदा कर देते हैं। क्यों इतनी प्रतिस्पर्धा है कि हर कोई एक-दूसरे को धक्का मार कर आगे निकलने के फेर में हैं। यदि ये जीवन यात्रा ही है तो हम एक-दूसरे की यात्रा में सहयोगी क्यों नहीं हो रहे? यदि ये जीवन की यात्रा मोक्ष की प्राप्ति के लिए ही है तो फिर इतना भोग-विलास क्यों? धरती पर इतनी मार-काट क्यों? इतने थोथरे उपदेश आखिर क्यों?
अध्यात्म में एक आकर्षण और एक प्रलोभन ने स्थान बना लिया है। आज लोगों में शुद्ध सात्विक और आध्यात्मिक चर्चा करने और करवाने का फैशन-सा हो गया है। पहले शोषण करके, छल करके और फरेब से झूठ-सच बोलकर पैसा कमाते हैं और उसके बाद करोड़ों रुपये के खर्च से पांडाल लगाकर आध्यात्मिक आयोजन करते हैं, कथा करते हैं और प्रतिष्ठा प्राप्त करने का प्रयत्न होता है। इस उद्यम में धन का जो आदान-प्रदान होता है वो अनावश्यक ही तो है?
कथा करने वाले और कथा सुनने वाले दोनों किनारों के बीच माया की खाई तो गहरी ही होती है। दो कूल हैं एक दुख का और एक उपदेश का। एक रोग का और एक चिकित्सा का। इसके बीच चिकित्सक एक सहयोगी की भूमिका में अब नहीं दिखता अब चिकित्सक रोग, रोगी और चिकित्सा के बीच का एजेंट होता जा रहा है, जो रोगी को रोग की विभीषिका से डराता है, चिकित्सा कर्म की महत्ता रोगी को नहीं बताता, वो रोगी को ये नहीं बताता कि यदि ऐसा न करो तो रोग ही न हो, हो भी जाए तो ये चिकित्सा कर लो ठीक हो जाएगा। वह रोगी को सामान्य-सा ज्ञान देने को तैयार नहीं है, जो उसने भी यहीं से पाया है? क्योंकि उसे पता है यदि उसने ऐसा किया तो वो रोगी से अपने हित कैसे साधेगा? लोग पहले रोग से रोगी को भयभीत करते हैं और फिर उसे धन कमाने के लिए सलाह या चिकित्सा को बेच देते हैं। ये जो खरीदने और बेचने का प्रचलन आज समाज में आया है ये ही पाप का मूल है।
इसी तरह से अध्यात्म के मार्ग पर भी कुछ उपदेशक केवल कथा कर्म से करोड़ों कमाकर अपने को विद्वान और अध्यात्म के मार्ग का पथिक मान बैठे हैं। अध्यात्म का भी अपना बाजार बन गया है, जहां उपदेश से लेकर उपक्रम तक सब बिकने लगा है।
यात्रा का यह एक विलक्षण परिदृश्य है जहां सब अपनी-अपनी यात्रा को बीच में छोड़कर मार्ग में ही अटकने लगे हैं। वे वस्तुओं के मोह में पड़ गए हैं, विलास के आनन्द में उलझ गए हैं।
आज के दौर की आध्यात्मकि यात्रा का मार्ग भी थोथरे निर्देशकों के कारण बहुत उथला हो गया है। बहुत उलझाने वाला है। न तो अधिकतम यात्रियों को ही अपना सही-सही गंतव्य पता है और न ही निर्देश करने वालों को। सब अपना अपना लक्ष्य साध रहे हैं। यात्रा का सही उद्देश्य तो यात्रा के आनन्द लेने में है।
आज के अध्यात्म में पैसों का लेनदेन है, विलासिता के साधनों को जोड़ने की होड़ है। खूब प्रदर्शन है और खूब बाजार है। यात्रा मार्ग पर चलने से पूरी होती है किंतु यहां तो इस अध्यात्म के मार्ग के दोनों तरफ भव्य मेला-सा लग गया है। यात्री का ध्यान यात्रा पर कम है दोनों तरफ सजे मेले में ज्यादा है।

