एक व्यक्ति संत सुकरात के पास बार-बार सम्पन्नता का आशीर्वाद लेने जाता, पर वे उसे बहलाकर टाल देते। एक बार संत ने देखा, वह व्यक्ति फल बेचने के लिए ले जा रहा है, तो स्वयं जाकर उसे संपन्नता का आशीर्वाद दिया। उसने हैरानी से पूछा कि बार-बार आग्रह पर भी आपने पहले आशीर्वाद नहीं दिया, पर अब स्वयं देने क्यों आए? संत ने कहा, ‘परिश्रमहीन व्यक्ति को आशीर्वाद भी फलित नहीं होता। अब तुम श्रम करने लगे, अतः स्वयं आशीर्वाद दिया।’
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