हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाई जी) के पास एक दिन एक व्यक्ति गीता वाटिका, गोरखपुर पहुंचा और गिड़गिड़ाकर बोला, ‘भाई जी, मेरी पत्नी बहुत रुग्ण है, अस्पताल में है। कुछ मदद कीजिए।’ भाई जी ने उसे तत्काल कुछ रुपये दे दिए। लगभग एक सप्ताह बाद वही व्यक्ति पुनः गीता वाटिका पहुंचा और भाई जी से बोला, ‘अस्पताल में मेरी पत्नी को बच्चा हुआ है। दवा तथा दूध आदि के लिए पैसे चाहिए।’ भाई जी ने फिर उसको कुछ रुपये थमा दिए। हफ्ते बाद वह तीसरी दफा फिर आया और बोला, ‘पत्नी तथा बच्चा दोनों मरणासन्न हैं, उनकी जान बचाने के लिए महंगी दवाएं खरीदनी हैं।’ भाई जी ने तीसरी बार भी उसे चुपचाप रुपये पकड़ा दिए। सात दिन के अन्तराल पर वह व्यक्ति चौथी दफा आया और रोता हुआ भाई जी से कहने लगा, ‘मेरी पत्नी मर गई। उसकी दाह-क्रिया के लिए कुछ व्यवस्था कीजिए।’ भाई जी ने इस बार भी उसे रुपये थमा दिए। वहां बैठे भाई जी के किसी मित्र ने कहा, ‘यह बहुत झूठा और धोखेबाज आदमी है। आपने हर बार उसे रुपये सौंप दिए।’ भाई जी हंसकर बोले, ‘मुझे पहले दिन से ही मालूम है कि न इसकी पत्नी बीमार है, न बच्चा पैदा हुआ है। अस्पताल में मृत्यु का तो प्रश्न ही नहीं उठता। किंतु जब यह मेरे पास मुंह लटकाकर आता था तो मुझे लगता था कि इसने पूर्व-जन्म में मुझे कुछ ऋण दे रखा था। मैंने वही कर्ज किस्तों में चुकाया है।’
+
Advertisement
Advertisement
Advertisement
×

