एक बार स्वामी रामकृष्ण परमहंस दक्षिणेश्वर मंदिर में आयोजित एक धार्मिक कार्यक्रम में शामिल हुए। पूजा-अर्चना के बाद भोग वितरित किया गया। जब सभी श्रद्धालु चले गए, तो स्वामी जी अपने स्थान से उठकर इधर-उधर पड़ी जूठी पत्तलों को समेटकर एक जगह रखने लगे। उन्हें ऐसा करते देख मंदिर का पुजारी दौड़ा आया और हाथ जोड़कर बोला, ‘स्वामी जी! आप यह क्या कर रहे हैं? इस कार्य के लिए नौकर-चाकर हैं।’ स्वामी जी मुस्कुराए और बोले, ‘इन पत्तलों को उठाकर मैं अपने भीतर के अहंकार को बाहर निकाल रहा हूं। ईश्वर तक पहुंचने की सीढ़ियां विनम्रता से होकर गुजरती हैं, जो अहंकार पर विजय पा लेते हैं, ईश्वर उन्हीं के हृदय में वास करते हैं।’
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