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गुस्से का मर्दन

एकदा

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एक बार संत रैदास काशी में अपने अनुयायियों के बीच प्रवचन कर रहे थे। इसी दौरान कुछ असामाजिक तत्व रैदास पर छींटाकशी करने लगे और उन्हें शारीरिक चोट पहुंचाने पर उतारू हो गए। यह देख रैदास के अनुयायी भड़क उठे। इस पर संत ने दुःखी होकर अपने भक्तों से कहा, ‘मारो-मारो, पर इन्हें नहीं।’ यह सुनते ही भक्तगण रुक गए और रैदास से पूछने लगे, ‘आप 'मारो-मारो' भी कह रहे हैं और साथ ही यह भी कह रहे हैं कि इन्हें नहीं। हम समझे नहीं।’ रैदास ने सहज भाव से कहा, ‘ मेरे कहने का आशय यह है कि इन्हें मत मारो, अगर मारना है तो अपने गुस्से को मारो, अपने अहंकार को मारो। इस व्यवस्था का अंत करो। ये नादान लोग हैं और अपने अहंकार के वशीभूत ऐसा कर रहे हैं। यदि आप भी इनका अनुसरण करोगे तो आप में और इनमें क्या अंतर रह जाएगा? मेरी शिक्षा का भी क्या अर्थ रह जाएगा?’ रैदास की यह बात सुनकर भक्तगण चुपचाप अपनी जगह पर बैठ गए। रैदास की विनम्रता देखकर उपद्रवी भी वापस चले गए।

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