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राष्ट्रभक्ति की मिसाल

एकदा

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साठ के दशक के आरंभ में जब विक्रम साराभाई तथा उनकी टीम भारत के प्रथम रॉकेट-प्रक्षेपण केंद्र के लिए उपयुक्त स्थान खोज रहे थे, तो उन्होंने केरल के एक छोटे से मछुआरा गांव थुंबा को चुना, जो चुंबकीय भूमध्य रेखा के निकट स्थित होने के कारण वैज्ञानिक दृष्टि से आदर्श था। किंतु समस्या यह थी कि आवश्यक भूमि पर सेंट मेरी मैगडलीन नामक चर्च तथा उसके आसपास बसे मछुआरा समुदाय के घर स्थित थे, जो उनकी संपूर्ण जीविका का आधार थे। साराभाई ने इस चुनौती का सामना बलपूर्वक अधिग्रहण से नहीं, अपितु संवाद तथा सम्मान से किया। उन्होंने बिशप पीटर बर्नार्ड परेरा से भेंट की, जिन्होंने सहायता का आश्वासन तो दिया, किंतु यह शर्त रखी कि साराभाई स्वयं रविवार की प्रार्थना-सभा के पश्चात चर्च की समस्त मंडली के समक्ष अपनी योजना प्रस्तुत करें। साराभाई ने ऐसा ही किया और भारत के भविष्य के लिए अंतरिक्ष कार्यक्रम के महत्व को स्पष्ट किया। इस पर बिशप तथा समस्त ग्रामवासियों ने एक असाधारण उदारता दिखाते हुए अपना चर्च, अपनी भूमि तथा अपने घर राष्ट्रीय उद्देश्य के लिए दान कर दिए। वही चर्च आगे चलकर इसरो का प्रथम कार्यालय तथा प्रयोगशाला बना।

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