बावा लाल जी महाराज का जन्म पाकिस्तान के कसूर जिले में 1355 ईस्वी में हुआ था। भारतीय तिथि के अनुसार यह 1455 संवत, माघ महीने की द्वितीय तिथि थी, जब माता कृष्णा और पिता भोला मल की पावन गोद में यह दिव्य बालक जन्मा।
बावा लाल जी महाराज का संबंध रामानंद संप्रदाय से था। यही कारण है कि उनके अनुयायी श्रद्धा, भक्ति और तपस्या के माध्यम से उनकी शिक्षाओं का पालन करते हैं।
यमुनानगर शहर के बीचोंबीच स्थित श्री लाल द्वारा मंदिर अपनी आध्यात्मिक महत्ता और दैवीय इतिहास के लिए प्रसिद्ध है। बीस जनवरी को देश के विभिन्न राज्यों में स्थित श्री लाल मंदिरों में बावा लाल दयाल जी महाराज का 670वां जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया जाएगा। कहा जाता है कि बावा लाल जी महाराज का जन्म पाकिस्तान के कसूर जिले में 1355 ईस्वी में हुआ था। भारतीय तिथि के अनुसार यह 1455 संवत, माघ महीने की द्वितीय तिथि थी, जब माता कृष्णा और पिता भोला मल की पावन गोद में यह दिव्य बालक जन्मा।
मंदिर के पुजारी बताते हैं कि बावा लाल जी महाराज का संबंध रामानंद संप्रदाय से था। यही कारण है कि उनके अनुयायी श्रद्धा, भक्ति और तपस्या के माध्यम से उनकी शिक्षाओं का पालन करते हैं।
मंदिर की स्थापना
बताया जाता है कि यहां की जमीन भक्तों द्वारा खरीद कर मंदिर की स्थापना की गई थी। मंदिर में बावा लाल जी महाराज की एक मूर्ति के साथ 22 अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं। इसके अलावा, तीन अन्य मंदिर भी हैं, जिनमें भगवान शिव, शीतला माता और हनुमान जी के मंदिर शामिल हैं। मंदिर में दो बहुत बड़े हाल हैं, जहां हर महीने की द्वितीय तिथि को बाबा लाल जी महाराज का जन्मोत्सव मनाया जाता है और बड़े स्तर पर भंडारा भी आयोजित होता है।
ज्योतिष और कर्मकांड की पढ़ाई
इस मंदिर में विद्यार्थियों को ज्योतिष और कर्मकांड की उच्च शिक्षा दी जाती है, जिससे उन्हें भारतीय ज्योतिष और कर्मकांड की गहन जानकारी मिलती है और इस विद्या की विरासत जीवित रहती है।
बताया जाता है कि बावा लाल जी महाराज ने बहुत कम समय में ही सारी शिक्षाएं ग्रहण कर ली थीं। उन्होंने हिंदी, संस्कृत, फारसी और उर्दू सभी भाषाओं का ज्ञान प्राप्त कर लिया और अपने हम उम्र के बच्चों को ही उपदेश देने लगे थे। उनकी इस अद्भुत प्रतिभा को देखकर सभी लोग चकित हो जाते थे।
बावा लाल जी महाराज योग विद्या में प्रवीण थे और कहा जाता है कि समय-समय पर अपने शरीर का कायाकल्प करते थे। किंवदंती है कि उनके अद्भुत योग के प्रभाव से उन्हें 314 वर्ष तक जीवित रहने का आशीर्वाद प्राप्त हुआ और वे अपने शिष्यों को निरंतर कृपा वर्षा करते रहे। ऐसा कहा जाता है कि हर सौ वर्ष में उनका शरीर फिर से 12 वर्ष के बालक जैसा हो जाता था।
बाबा लाल जी महाराज के जीवन और शिक्षाओं पर कई पुस्तकें लिखी गई हैं, और उनके दिव्य गुणों से जुड़ी लोककथाएं भक्तों में आज भी प्रचलित हैं। कहा जाता है कि मुगल बादशाह शाहजहां और उनके पुत्र दारा शिकोह तथा औरंगजेब भी उनके शिष्य रहे।
बावा लाल दयाल महाराज समाज के सभी वर्गों पर गहरा प्रभाव डालने वाले संत थे। उनके पूरे विश्व में 22 गद्दियां यानी 22 प्रमुख मंदिर हैं। मुख्य गद्दी पंजाब के गुरदासपुर जिले के ध्यानपुर में स्थित है, जहां वर्तमान में 1008 महंत रामसुंदर दास जी विराजमान हैं। कहा जाता है कि ध्यानपुर में स्थित बावली में स्नान करने से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं, और निसंतान दंपतियों को संतान प्राप्त होती है। इसके अलावा, पाकिस्तान के लाहौर में उन्हें आज भी लाल पीर के नाम से जाना जाता है। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में भी उनका प्रसिद्ध तीर्थ स्थल मौजूद है।

