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साझी संस्कृति की अनूठी ऐतिहासिक यात्रा

नंदा राजजात

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नंदा देवी राजजात उत्तराखंड की अनूठी धार्मिक-आध्यात्मिक यात्रा है, जो मां नंदा को ध्याण के रूप में कैलास विदा करने की भावुक परंपरा, लोकविश्वास, इतिहास और रोमांच को समेटे हुए है।

नंदा राजजात का धार्मिक, आध्यात्मिक और ऐतिहासिक महत्त्व है। यह यात्रा रहस्य और रोमांच से भरपूर है। 9वीं सदी में गढ़वाल के तत्कालीन राजा ने यह यात्रा शुरू की। तब से यह धार्मिक यात्रा हर 12 वर्ष के बाद आयोजित की जाती है। हालांकि, सन 1905 से 2014 के बीच अब तक केवल सात बार यह यात्रा आयोजित की गई।

यात्रा में 280 किलोमीटर तक बर्फीले रास्तों और कठिन रास्तों से होकर अंतिम पड़ाव रूप कुंड (होमकुंड) में पहुंचा जाता है। ख़ास बात यह कि यात्रा की अगुवाई चार सींगों वाला भेड़ (चौसिंग्या खाड़ू) करता है। इस यात्रा को एशिया की सबसे लंबी और कठिन पैदल धार्मिक यात्रा माना जाता है।

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उत्तराखंड देवभूमि में मां नंदा केवल देवी नहीं, बल्कि पहाड़ की विवाहित बेटी (ध्याण) के रूप में मान्यता रखती हैं।

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नंदा राजजात महज़ यात्रा नहीं, बल्कि विशुद्ध रूप से धार्मिक और आध्यात्मिक यात्रा है। यह अपनी ध्याणी (विवाहिता बेटी) को मायके से ससुराल (कैलाश पर्वत) विदा करने का अनूठा और भावुक लोक-उत्सव है। प्रतिवर्ष भाद्रपद मास में नंदा-जात (छोटी जात) आयोजित होती हैं। लेकिन नंदादेवी राजजात तय समय में परंपरा और शास्त्रों के अनुसार ही आयोजित की जाती है।

280 किमी का कठिन-निर्जन सफ़र

उत्तराखंड राज्य के सीमांत जनपद चमोली के नौटी गांव से शुरू होकर यात्रा उच्च हिमालय क्षेत्र होमकुंड पर ठहरती है। समुद्र की गहराई से 17,500 फीट की ऊंचाई तक जाने वाली यह यात्रा 20 दिनों में पूरी होती है। पैदल और कड़ाके की ठंड। श्रद्धालु कड़ाके की ठंड, घने जंगलों, खड़ी चट्टानी चढ़ाइयों और ऑक्सीजन की कमी वाले रास्तों से गुज़रते हैं।

रिंगाल से बनती पवित्र छंतोली

राजजात की अगुवाई के लिए रिंगाल (विशेष प्रजाति का पहाड़ी बांस) से बनी एक छतरी बनाई जाती है। इसे छंतोली कहा जाता है। स्थानीय मान्यतानुसार इसको मां नंदा का प्रतीक मानकर पूरे रास्ते अत्यंत श्रद्धा से ले जाया जाता है। इसको लेकर जाने वालों को पूरे नियम और संयम का पालन करना होता है।

यात्रा से पहले दो धार्मिक आयोजन

नंदादेवी राजजात आयोजन से पहले दो प्रमुख धार्मिक आयोजन होते हैं। इसमें एक मोडवी और दूसरा मनौती।

मोडवी उत्सव में स्थानीय क्षेत्रपाल और उफ़राई देवी की पूजा-अर्चना की जाती है। मोडवी के बाद चौसिंग्या मेड़ा के उत्पन्न होने की सूचना राजकुंवरों को विधिवत रूप से दी जाती है। इसके बाद राजकुंवर मां नंदा से मनौती मांगते हैं। इसके बाद राजकुमारों द्वारा मां नंदा से मनौती मांगी जाती है।

चौसिंग्या खाड़ू (चार सींगों वाली भेड़)

इस यात्रा में चार सींगों वाला नर भेड़ (चौसिंग्या खाड़ू) केंद्र में होता है। लोक-मान्यता है कि जब 12 साल बाद राजजात का समय आता है, तो चांदपुर गढ़ी क्षेत्र के किसी भी गांव में चार सींगों वाला भेड़ जन्मता है। जो चौसिंग्या खाड़ू मान्यता और शास्त्रों के अनुरूप खरा उतरता है, उसका चयन किया जाता है। चौसिंग्या खाड़ू के चयन का अधिकार कासवा गांव, चांदपुर क्षेत्र और राजवंशी कुंवरों के पास है। इसके बाद राजकुंवरों द्वारा मां से मनौती मांगी जाती है। चौसिंग्या खाड़ू बिना किसी रस्सी या किसी सहायता के यात्रा की अगुवाई करते हुए 280 किलोमीटर तक स्वयं रास्ता दिखाता है।

अकेले कैलास की ओर प्रस्थान

होमकुंड में अंतिम पूजा और अन्य अनुष्ठान के बाद यह चौसिंग्या खाड़ू मां नंदा देवी के वस्त्र, आभूषण और प्रसाद अपनी पीठ पर लादकर अकेले निर्जन, बर्फ से ढके उच्च हिमालय क्षेत्र की ओर प्रस्थान करता है। बताया जाता है कि वह कभी वापस दिखाई नहीं देता।

बेटी की भावुक विदाई

इस यात्रा का पहला और अंतिम पड़ाव बड़ा भावुक होता है। अंतिम पड़ाव होमकुंड में जब मां नंदा की विदाई का समय आता है तो उस समय यात्रा में शामिल हर व्यक्ति की आंखें नम हो जाती हैं। उनकी आंखों से आंसुओं की धारा बह निकलती है। पारंपरिक जागरों के साथ मां नंदा को कैलाश के लिए विदा किया जाता है। यह पल ठीक उसी तरह का होता है, जब किसी बेटी को उसके ससुराल विदा किया जाता है।

गढ़वाल-कुमाऊं की साझी संस्कृति

यह यात्रा गढ़वाल और कुमाऊं की साझा संस्कृति की मिसाल है। इसमें स्थानीय पारंपरिक जागर, लोकगीत, पारंपरिक वाद्य ढोल-दमाऊ यात्रा की ख़ास पहचान हैं। इसमें गढ़वाल और कुमाऊं मंडल की देव छंतोलियां भी सम्मिलित होती हैं। सभी अंतिम पड़ाव तक साथ चलती हैं।

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