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मंदिरों के नगर में कला और अध्यात्म की विरासत

पालीताणा

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पालीताणा, गुजरात का एक ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल है, जो शत्रुंजय पर्वत पर स्थित है। यहां 900 से अधिक मंदिर हैं, जो जैन धर्म की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर और अद्भुत शिल्पकला को दर्शाते हैं। यह तीर्थ स्थल भक्ति,कलात्मक श्रेष्ठता व अहिंसा के प्रतीक के रूप में प्रसिद्ध है।

भक्ति, कला और अहिंसा के वातावरण का अद्भुत संगम है गुजरात के भावनगर जिले में स्थित पालीताणा शहर। यह मात्र एक शहर नहीं, बल्कि आस्था का वह स्थल है जहां पहुंचकर हर श्रद्धालु स्वयं को परमात्मा के निकट पाता है। पालीताणा केवल पत्थरों की नक्काशी नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं का जीवंत दस्तावेज है। इसकी आध्यात्मिक ऊर्जा और शांत वातावरण हर आगंतुक को अंतर्मन की यात्रा पर ले जाता है। यह वह स्थान है जहां धर्म, कला और प्रकृति एक साथ मिलकर मानव को उच्चतर चेतना का अनुभव कराते हैं।

शत्रुंजय तट पर बसा तीर्थ

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शत्रुंजय नदी के तट पर और शत्रुंजय पर्वत की गोद में बसा यह तीर्थ ‘मंदिरों के नगर’ के रूप में विश्वविख्यात है। यहां की प्रत्येक शिला और हर मंदिर जैन धर्म की गौरवशाली सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत की कहानी कहता है।

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सिद्धों की पावन भूमि

जैन धर्म का पालन करने वाले श्रद्धालुओं के हृदय में पालीताणा का महत्वपूर्ण स्थान है। मान्यता है कि जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों में से 23 ने इस पर्वत को अपनी उपस्थिति से पवित्र किया था। प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव) ने यहां अनंत बार विचरण किया और उनके प्रथम उपदेश की गूंज आज भी इन पहाड़ियों में महसूस की जा सकती है। यह ‘शाश्वत तीर्थ’ माना जाता है, जहां से अनगिनत आत्माओं के लिए मोक्ष की राह प्रशस्त हुई। प्रत्येक जैन श्रद्धालु का स्वप्न होता है कि वह जीवन में कम से कम एक बार यहां 3,500 से अधिक सीढ़ियों को चढ़कर भगवान के दर्शन करे।

शत्रुंजय पर्वत पर लगभग 900 मंदिर स्थित हैं, जिनमें 17,000 से अधिक प्रभु प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हैं। ये मंदिर संगमरमर की नक्काशी का ऐसा उत्कृष्ट उदाहरण हैं, जिसकी तुलना विश्व में अन्यत्र दुर्लभ है।

आदिश्वर मंदिर : आदिश्वर मंदिर इस पर्वत का सबसे भव्य और मुख्य मंदिर है, जो सर्वोच्च चोटी पर स्थित है। माना जाता है कि इस स्थान पर भगवान आदिनाथ ने ज्ञान प्राप्त किया था। भगवान आदिनाथ या ऋषभदेव जी की स्वर्णमयी प्रतिमा और मंदिर की सूक्ष्म नक्काशी भक्तों को मंत्रमुग्ध कर देती है।

भगवान आदिनाथ या ऋषभदेव जैन धर्म के वर्तमान अवसर्पिणी काल (समय चक्र) के प्रथम तीर्थंकर हैं। उन्हें ‘ऋषभदेव’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि उनकी माता मरुदेवी ने जन्म से पहले ‘वृषभ’ (बैल) का सपना देखा था। वे पहले तीर्थंकर हैं, इसलिए उन्हें ‘आदिनाथ’ (आदि अर्थात‍् प्रथम नाथ यानी भगवान) कहा जाता है। उनका जन्म अयोध्या नगरी में चैत्र कृष्ण नवमी को नाभिराज (पिता) और मरुदेवी (माता) के घर हुआ था। वे सभ्यता के प्रवर्तक माने जाते हैं। उन्होंने ही लोगों को असि (तलवार), मसि (लिखना), कृषि (खेती), विद्या, वाणिज्य (व्यापार) और शिल्प (कला) की शिक्षा दी थी।

चौमुख मंदिर : चौमुख मंदिर का निर्माण 1618 में हुआ था। यह विशाल मंदिर चार मुखों वाला है, जहां से भगवान के दर्शन चारों दिशाओं में होते हैं। इसलिए इसे चौमुख मंदिर कहते हैं।

मुख्य मंदिर समूह (टूंक)

शत्रुंजय पर्वत पर मंदिरों को छोटे-छोटे समूहों में विभाजित किया गया है, जिन्हें टूंक कहा जाता है। यहां स्थित कुमारपाल टूंक सबसे प्राचीन और प्रमुख टूकों में से एक है। विमलशाह टूंक में भी भव्य मंदिर और नक्काशीदार मूर्तियां हैं। साथ ही यहां विभिन्न तीर्थंकरों को समर्पित 9 मुख्य टूंकों में से प्रत्येक का अपना ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व है।

अन्य महत्वपूर्ण मंदिर

पुंडरीक स्वामी का मंदिर : यह भगवान आदिनाथ के प्रमुख शिष्य पुंडरीक स्वामी को समर्पित है, जिन्होंने इसी पर्वत से मोक्ष (जैन मत अनुसार) प्राप्त किया था।

अष्टपद मंदिर : यह मंदिर अष्टपद (जहां आदिनाथ मोक्ष हेतु गए) का प्रतीक माना जाता है।

रायण वृक्ष : भगवान आदिनाथ ने इस पवित्र वृक्ष के नीचे तपस्या की थी। इस स्थान पर जाने वाले भक्त यहां अवश्य रुकते हैं।

भरत चक्रवर्ती का मंदिर : यह मंदिर राजा भरत (आदिनाथ के पुत्र) से संबंधित है, जिन्होंने सबसे पहला जिनालय बनवाया था।

मंदिरों के नियम

मान्यता है कि सूर्यास्त के बाद पर्वत पर केवल देवताओं का वास होता है, इसलिए रात में किसी भी मनुष्य (यहां तक कि पुजारियों को भी) को ऊपर रुकने की अनुमति नहीं है। श्रद्धालु खाली पेट और मौन रहकर सीढ़ियां चढ़ते हैं, जिसे भक्ति की एक कठिन तपस्या माना जाता है।

प्रथम शाकाहारी शहर

पालीताणा के नाम एक अद्वितीय उपलब्धि दर्ज है—यह दुनिया का पहला कानूनी रूप से शाकाहारी शहर है। वर्ष 2014 में जैन मुनियों के प्रयासों के बाद यहां मांसाहार, अंडे और पशु हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया। यह निर्णय जैन धर्म के मूल सिद्धांत ‘अहिंसा परमो धर्म:’ का सजीव उदाहरण पेश करता है।

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