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नई जीवन ऊर्जा संग सामूहिकता का पर्व

लोहड़ी

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लोहड़ी सिर्फ त्योहार नहीं, बल्कि पंजाब की मिट्टी, आग की लौ और लोकगीतों का जीवंत संगम है। यह सर्दी की ठंड में जीवन ऊर्जा, सामूहिक उल्लास और संस्कृति की धड़कन को प्रकट करता है।

कुछ पर्व पंजाब की मिट्टी में ऐसे रचे बसे हैं, जो सिर्फ तिथियों से नहीं बल्कि अपनी धड़कनों से पहचाने जाते हैं। लोहड़ी भी उन्हीं में से एक है, एक ऐसा पर्व जो आग की लपटों, लोकगीतों की चमकों और सामूहिक उल्लास के बीच इंसान के प्रकृति से रिश्ते को उत्सव में बदलने का माहौल रचता है। यह पर्व सिर्फ मौसम के बदलने की सूचना भर नहीं देता बल्कि पंजाबी समाज के उद्दाम, बेफिक्र और जीवंत सांस्कृतिक स्वभाव को पूरी तीव्रता से उजागर करता है।

ऋतु परिवर्तन में लोक आस्था

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लोहड़ी पर्व हर साल आमतौर पर 13 जनवरी को ही मनाया जाता है, जब शीत ऋतु अपने चरम पर होती है और सूर्य उत्तरायण होने के कगार यानी संधिकाल में खड़ा होता है। कृषि प्रधान समाज के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण समय होता है। रबी की फसल खेतों में लहलहाने लगती है और किसान के मन में आशा का दीप जगमगाने लगता है। लोहड़ी इसी भावना को उत्सव में बदल देती है। आग के चारों ओर लोग इकट्ठा होते हैं, प्रकृति को धन्यवाद देते हैं और समृद्धि की कामना करते हैं।

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सामूहिकता का अनुष्ठान

लोहड़ी की पहचान अलाव से है। अलाव अगर कोई व्यक्ति अकेला सेंके तो अटपटा लगता है। इसलिए लोहड़ी के लिए सामूहिकता महत्वपूर्ण फैक्टर है। जब लोहड़ी का अलाव जलता है, उसमें लकड़ियां और उपले डाले जाते हैं तो वह केवल सर्दी से राहत भर नहीं देता बल्कि प्रतीक के तौर पर जीवन ऊर्जा का सबब बनता है और लोगों को आपस में जोड़ता है। पंजाब ही नहीं पूरे हिंदू संस्कृति में यह मान्यता है कि आग हर वस्तु को शुद्ध करती है। इसलिए नए साल की शुरुआत इस शुद्धता या पवित्रता से भी की जाती है। लोग अलाव की परिक्रमा करते हैं। तिल, गुड़, मूंगफली और रेवड़ी अर्पित करते हैं, मानो यह प्रकृति से जीवंत संवाद हो रहा हो। सामूहिक कर्मकांड व्यक्ति को अकेला नहीं रहने देता बल्कि समूह में विलीन कर देता है और अमीर, गरीब तथा छोटे-बड़े का भेदभाव खत्म हो जाता है।

लोकगीतों में दुल्ला भट्टी

लोहड़ी का पर्व लोकगीतों के बिना अधूरा है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी की जुबान में लोहड़ी के पारंपरिक बोल होते हैं—‘सुंदर, मुंदरिये हो...’। इन गीतों में दरअसल, दुल्ला भट्टी का उल्लेख अनिवार्य रूप से होता है। दुल्ला भट्टी एक लोकनायक है, जिसने अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाई थी और बेटियों की रक्षा की थी। इसलिए लोहड़ी के लोकगीतों में दुल्ला भट्टी का गुणगान गाया जाता है। गौरतलब है कि दुल्ला भट्टी सिर्फ ऐतिहासिक पात्र भर नहीं है, वह साहस, मानवीय करुणा और न्याय का प्रतीक है। वह बताता है कि पंजाबी संस्कृति उत्सव के बीच भी नैतिक मूल्यों को नहीं भूलती। इसलिए लोहड़ी की रात जब ढोल की थाप पर भांगड़ा और गिद्धा का जोश अपने परवान पर होता है, तब भी लोकगीतों में दुल्ला भट्टी की न्यायप्रियता और उसके साहस पर न्यौछावर होने को नहीं भूला जाता। मतलब साफ है कि भांगड़ा और गिद्धा के जोश में लोग उस महान नायक की साहस गाथा को नहीं भूलते, जिसने आतताई शासकों से पंजाबी बेटियों की रक्षा की थी।

सादगी में स्वाद

लोहड़ी पर्व चाहे जितना बड़ा और जितनी मस्ती का प्रतीक हो, लेकिन इस पूरे पर्व में खानपान बेहद सादगीभरा होता है। जो पंजाबी जीवनदर्शन का मूल है। तिल, गुड़, मूंगफली, मक्का, ये सभी शीत ऋतु के अनुकूल और ऊर्जा देने वाले खाद्य हैं। यह पर्व दिखाता है कि उत्सव सिर्फ भव्य व्यंजनों का मोहताज नहीं, मिट्टी से जुड़े स्वाद भी उल्लास रच सकते हैं। लोहड़ी का सामाजिक पक्ष तब और प्रखर हो जाता है, जब घर में कोई नई बहू या नवजात शिशु की पहली लोहड़ी मनाई जाती है। यह केवल पारंपरिक और पारिवारिक खुशी भर नहीं होती बल्कि समाज द्वारा नए जीवन का स्वागत होता है। उपहार, गीत और सामूहिक सहभागिता—ये सब मिलकर लोहड़ी को एक सामुदायिक उत्सव बना देते हैं।

उद्दाम सांस्कृतिक उल्लास

लोहड़ी का सबसे बड़ा आकर्षण इसका अल्हड़पन है। कोई औपचारिकता नहीं, कोई दिखावा नहीं। जो मन में है, वही नृत्य है, वही भीतर की आग है, वही अलाव की आग है। यह पर्व बताता है कि पंजाबी संस्कृति जीवन को अत्यधिक गंभीरता से नहीं बल्कि जीवंतता से लेती है। यहां हंसी भी ऊंची होती है और गीत भी बुलंद। ऐसे में उत्सव का ठाठ तो बनता ही है। यही कारण है कि लोहड़ी आज गांवों से निकलकर हमारे चमकते दमकते शहरों को भी खूब आकर्षित कर रही है और जो पंजाबी संस्कृति की खास विशेषता है, यह अपने लोगों को तो इसके सुरूर में रखती ही है, दूसरे समुदायों को भी खूब आकर्षित करती है। यही कारण है कि पंजाबी संस्कृति हमेशा समाज में सिर चढ़कर बोलती है और लोहड़ी उसका एक जीवंत प्रतीक है। इ.रि.सें.

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