इस पर्व को आध्यात्मिक और वैज्ञानिक बोध का एक समग्र सेतु कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। अब पश्चिम के लोग भी इस बात को स्वीकारते हैं कि मकर संक्रांति हमें, यानी इंसानों को, ‘कॉस्मिक क्लॉक’ से जोड़ती है। इसलिए कई लोग मकर संक्रांति को पर्वों का विशिष्ट वैज्ञानिक पर्व भी मानते हैं।
मकर संक्रांति महज एक धार्मिक पर्व नहीं बल्कि कालगणना का वैज्ञानिक विवेक, खगोलशास्त्र की दूरदृष्टि और सनातन संस्कृति की त्रिवेणी है। वास्तव में मकर संक्रांति वह क्षण है, जब सूर्य खगोलीय दृष्टि से अपनी यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ लेता है। भारतीय सभ्यता इसे उत्सव, आहार और जीवनदृष्टि से जोड़कर देखती है। 21वीं सदी का वैज्ञानिक मन जब इसे उल्लासबोध से सेलिब्रेट करता है, तो वह किसी अंधविश्वास को नहीं बल्कि अत्यंत सूक्ष्म वैज्ञानिकबोध का सम्मान करता है। क्योंकि मकर संक्रांति वैज्ञानिक समझ और प्रकृति के साथ सामंजस्य का संगम है।
सूर्य का उत्तरायण होना
मकर संक्रांति गणित और खगोल दृष्टि से उस दिन को संबोधित होती है, जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है और उसकी गति दक्षिणायण से उत्तरायण की ओर मुड़ती है। यह घटना वास्तव में पृथ्वी के अक्षीय झुकाव (लगभग 23.50 डिग्री) और सूर्य के सापेक्ष पृथ्वी की स्थिति से जुड़ी है। सूर्य के उत्तरायण होते ही दिन धीरे-धीरे लंबे और रातें छोटी होने लगती हैं। आधुनिक विज्ञान इसे ऋतु परिवर्तन और सौर वितरण में वृद्धि से जोड़ता है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि जब आधुनिक विज्ञान का दूर-दूर तक कहीं पता नहीं था, भारत में तब भी यानी आज के हजारों वर्ष पहले भी मकर संक्रांति का यही महत्व और यही सम्मान था। वास्तव में पूरी दुनिया में इस तिथि को एक पर्व और संस्कृति के संगम के रूप में चिन्हित करने और उत्सव मनाने की परंपरा सिर्फ भारत में ही है। भारतीयों को ही इस वैज्ञानिक घटनाक्रम की पूर्णता के साथ समझ थी।
स्वास्थ्य के सरोकार
21वीं सदी का पोषण विज्ञान मकर संक्रांति के मौके पर भारतीयों के आहार चयन को देखकर चकित रह जाता है। इस दिन परंपरा के मुताबिक भारतीय काले तिल, जो कि ओमेगा-6, कैल्शियम और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होता है। इसी तरह इस दिन खाया जाने वाला गुड़ आयरन, मिनरल और प्राकृतिक ऊर्जा का स्रोत होता है। मतलब साफ है कि शीत ऋतु में शरीर को ऊष्मा और ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जिसकी पूर्ति के लिए हजारों साल पहले हमारे पूर्वजों ने तिल और गुड़ का चयन किया था। आज पोषण विज्ञान के महारत लोग जानते हैं कि इन चीजों की बदौलत इस ऋतु में हमारा मेटाबॉलिज्म न केवल संतुलित बल्कि बेहद सक्रिय रहता है और जोड़ों व त्वचा तथा प्रतिरक्षा प्रणाली को लाभ पहुंचाता है। भारतीय परंपरा में एक लोककथन यानी कहावत है ‘तिल गुड़ खाओ, मीठा मीठा बोलो’। वास्तव में पोषण वैज्ञानिक यह जानकर हैरान हैं कि कैसे आधुनिक विज्ञान से पहले हमारी परंपरा निर्धारित करने वाले पूर्वज आहार और व्यवहार की यह वैज्ञानिक समझ रखते थे।
अर्थव्यवस्था से जुड़ा पर्व
मकर संक्रांति सिर्फ धार्मिक परायण का ही पर्व नहीं है बल्कि यह भारत के कृषि समाज की महत्ता को भी दर्शाता है। मकर संक्रांति एक ऐसे समय पर आती है, जब खरीफ की फसल कटकर घर में आ चुकी होती है और रबी की फसल के लिए तैयारियां शुरू हो जाती हैं। इसलिए आधुनिक जीवनबोध में मकर संक्रांति को हार्वेस्ट फेस्टिवल के दायरे में रखा जाता है, यानी ऐसा त्योहार या पर्व जो फसलों और ग्रामीण जीवन से महत्वपूर्ण नाता रखता हो। इस तरह देखें तो मकर संक्रांति में वह सामाजिकबोध और मनोवैज्ञानिक संतुलन है, जो इसे एक विशेष पर्व का दर्जा देता है। पश्चिम भारत में मकर संक्रांति के समय पतंग उड़ाकर उत्सव मनाया जाता है। पतंग का भी बहुत वैज्ञानिक बोध से जुड़ा मनोविज्ञान है। वास्तव में यह सिर्फ मनोरंजन नहीं है बल्कि सामूहिक खुशी, स्ट्रेस रिलीज एक्टिविटीज आदि से संदर्भित हैं। खुले आसमान की तरफ देखना, इससे न चाहते हुए भी हमारी नजरें सूरज से दोचार होती हैं। यह गतिविधि वास्तव में हमारे शरीर के लिए कई तरह से महत्वपूर्ण है। इससे आंखों की ताकत बढ़ती है, शरीर को विटामिन डी मिलती है और सामूहिक रूप से पतंग उड़ाने पर सहज सामाजिक जुड़ाव महसूस होता है। इस तरह हम आज के स्क्रीन मोह से जुड़े जीवन से बाहर निकलकर खुले आकाश में वास्तविक जिंदगी जीते हैं।
समय की संस्कृति का बोध
मकर संक्रांति की सबसे बड़ी सांस्कृतिक विशेषता समय को शुभ मानने से जुड़ी है। दरअसल, मकर संक्रांति हमें सीख देती है कि सूर्य का दिशा बदलना प्रतीक है कि अंधकार से प्रकाश की ओर जाना ही जीवन है या कि ठहराव से गति की ओर बढ़ना ही प्रगति है। इसलिए भारतीय संस्कृति में समय यानी काल को शत्रु नहीं, सहचर माना गया है। इसलिए ‘संक्रांति’ कोई ‘कटऑफ डेट’ नहीं होती बल्कि नवआरंभ का प्रतीक होती है। भारतीय परंपरा में यह दिन विवाह, दान, संकल्प और सामाजिक मेल-जोल के दिन के रूप में भी जाना जाता है। साथ ही 21वीं सदी का जो सबसे बड़ा संकट यानी लोगों का प्रकृति से कटाव का संकट है, उसे भी यह दिन अच्छी तरह से संबोधित करता है। मकर संक्रांति इसके विपरीत हमें सूर्य, ऋतु, अन्न, पशु और समाज के प्रति कृतज्ञ बनाती है। हालांकि आज हमें पतंगों की डोर में इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक और प्रदूषण पर भी आत्मचिंतन करना होगा, क्योंकि 21वीं सदी की यही मांग है। लेकिन अगर इस पर्व को आध्यात्मिक और वैज्ञानिकबोध का एक समग्र सेतु कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। अब पश्चिम के लोग भी इस बात को स्वीकारते हैं कि मकर संक्रांति हमें, यानी इंसानों को, ‘कॉस्मिक क्लॉक’ से जोड़ती है। इसलिए कई लोग मकर संक्रांति को पर्वों का विशिष्ट वैज्ञानिक पर्व भी मानते हैं। इ.रि.सें.

