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भक्ति, संयम और आत्मिक शुद्धि का उत्सव

सफला एकादशी

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मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली सफला एकादशी विशेष महत्व रखती है। इस दिन भक्त भगवान विष्णु की उपासना करते हैं, उपवास रखते हैं और दान करते हैं। यह आत्मिक शुद्धि, अनुशासन और भक्ति का उत्सव है, जिससे जीवन में शांति , सफलता और समृद्धि प्राप्त हो सके।

मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली सफला एकादशी, वैदिक परंपरा की उन विशेष तिथियों में से एक है, जिन पर श्रद्धा का हर क्षण भगवान विष्णु की कृपा से जुड़ता है। भारतीय संस्कृति में एकादशी न केवल उपवास का दिन होता है, बल्कि अपने भीतर निहित अनुशासन, संयम और आध्यात्मिक ऊर्जा का उत्सव भी होता है। यूं तो हर माह में दो व साल में 24 एकादशी होती हैं, लेकिन सफला एकादशी विशेष मानी जाती है। इसे सफला एकादशी इसलिए कहते हैं, कि इसका व्रत रखने पर भक्त की सभी मनोकामनाएं सफल होती हैं। लोकमान्यता है कि इस एकादशी को किया गया व्रत भक्त के जीवन में कोई संकट नहीं आने देता। सफला का अर्थ ही है जीवन को सफल बनाने वाली।

भगवान विष्णु की विशेष उपासना

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इस दिन भगवान विष्णु की विशेष उपासना की जाती है। लोग भक्ति, दान और उपवास के सामंजस्य से अपना जीवन संयमित और अनुशासित बनाते हैं। इससे मन की शुद्धि, विचारों की स्थिरता और सकारात्मकता का अनुभव गहराता है। योगशास्त्र के अनुसार चंद्रमा की एकादशी तिथि मन शांत करने की श्रेष्ठ तिथियों में से एक है। एकादशी के दिन ध्यान, उपवास और प्रार्थना का प्रभाव बाकी दिनों सेे ज्यादा होता है। यह सिद्धि-दायिनी तिथि मानी जाती है। इस दिन भक्त अपनी इच्छाओं, परिवार में सुख-शांति, कार्य में सफलता, स्वास्थ्य व प्रगति, को भगवान विष्णु के समक्ष प्रकट करते हैं।

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संकल्प और अनुशासन में प्रवेश

सफला एकादशी का व्रत और महात्म्य विष्णु पुराण और पद्मपुराण में वर्णित है। माना जाता है कि यह व्रत सौभाग्य को बढ़ाता है। साथ ही नए संकल्प और अनुशासनों का प्रवेश द्वार होता है। इसके सामाजिक और सांस्कृतिक आयाम भी हैं। दरअसल, यह एकादशी भारतीय समाज में दान और कल्याण की परंपरा का प्रतीक है। इस दिन भोजन, फल, वस्त्र, घी या किसी अन्य उपयोगी वस्तु का दान किया जाता है। इस दिन कीर्तन, सत्संग और भजन के आयोजन होते हैं, जो लोगों को आपस में जोड़ते हैं। यह एकादशी किसानों और व्यवसायियों के लिए भी प्रिय है, क्योंकि इस दिन वे नए कामों का संकल्प लेते हैं।

‘ओम नमो भगवते वासुदेवाय’ का मंत्र

सफला एकादशी के व्रत में भक्ति और अनुशासन का विशिष्ट मेल होता है। व्रती प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और भगवान विष्णु के समक्ष उपवास का संकल्प लेते हैं। भगवान विष्णु का पूजन किया जाता है। ‘ओम नमो भगवते वासुदेवाय’ का मंत्र जाप किया जाता है। रात्रि समय भजन, कीर्तन और कथा श्रवण करने को शुभ माना जाता है। द्वादशी की सुबह उपवास खोला जाता है और दान करते हैं। इस दिन का संदेश है -तामसिक भोजन का त्याग और इच्छाओं पर नियंत्रण ।

सफला एकादशी से जुड़ी कथा

इस एकादशी से जुड़ी कथा के मुताबिक राजा महिषमति का पुत्र लुबंक अनाचरण वाला था। इसलिए राजा ने उसे राज्य से निष्कासित कर दिया। इसके बाद लुबंक जंगल में रहकर चोरी करता और धीरे-धीरे जीवन में नीचे गिरता चला गया। एक दिन कड़ाके की ठंड थी, वह एक पेड़ के नीचे बैठा था, उसके पास न तो कुछ खाने को था और न ही सर्दी से बचने की कोई व्यवस्था। इस तरह उसने अनजाने में एकादशी का पूरा उपवास कर लिया। अगले दिन जब उसे कुछ फल मिले, तो वह उन्हें एक वृक्ष के नीचे रखकर विश्राम करने लगा। यह सरल कर्म भगवान विष्णु द्वारा अपनी पूजा के रूप में स्वीकार कर लिया गया। इस तरह लुबंक का उपवास, फल अर्पण और मन की निष्कलंक स्थिति सब मिलकर ईश कृपा का कारण बने। नतीजा यह हुआ कि वह अचानक स्वयं में परिवर्तन महसूस करने लगा। इसके बाद उसके मन में पश्चाताप जागा, हृदय पवित्र हुआ और राजा ने उसे फिर से राज्य में वापस बुलाकर एक योग्य शासक बना दिया।

आचरण की शुचिता है महत्वपूर्ण

उक्त कथा का सार यह है कि भगवत कृपा के लिए आडंबरपूर्ण व्यवहार नहीं होना चाहिए, बल्कि सच्चाई और आचरण से अपनी शुचिता बरकरार रखनी चाहिए। जो ऐसा करते हैं, उनकी किसी न किसी दिन सम्पूर्ण मनोकामना पूर्ण होती है। क्योंकि ईश्वर की कृपा पाने के लिए किसी प्रकार के पाखंड की आवश्यकता नहीं होती। सफला एकादशी व्रत भारतीय जीवन पद्धति में एक ऐसा भावनात्मक उत्सव है, जो भक्तों को सफलता, शांति और सद्भाव की ओर ले जाता है और इसी अर्थ में यह तिथि भक्तों की मनोकामना को सफल कर देती है। इ.रि.सें.

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