झारखंड-दिल्ली में कांग्रेस को महाराष्ट्र जैसी उम्मीद

हरीश लखेड़ा/ट्रिन्यू नयी दिल्ली, 1 दिसंबर महाराष्ट्र में विपरीत विचारधारा वाली शिवसेना के साथ सरकार बनाने के सफल प्रयोग के बाद कांग्रेस को अब झारखंड और दिल्ली में भी अपनी संभावनाएं दिखने लगी हैं। पार्टी हाईकमान अब दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए यूपीए के सहयोगी दलों को एकजुट करने पर विचार कर रही है। दिल्ली में राकांपा, आरजेडी समेत कई दल हर बार चुनाव में ताल ठोकते हैं। हालांकि, दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए मुख्य मुकाबला सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (आप) और भाजपा के बीच होने की सभांवना दिख रही है, लेकिन महाराष्ट्र को भाजपा से छीन लेने के बाद कांग्रेस की झारखंड और दिल्ली को लेकर भी उम्मीदें जग गई हैं। झारखंड में कांग्रेस, आरजेडी और झारखंड मुक्ति मार्चा मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा अकेले मैदान में है। वहां एनडीए के घटक दल भाजपा, जनतादल (यू), लोक जनशक्ति पार्टी व आजसू अलग-अलग चुनाव मैदान में हैं। भाजपा 5 साल सरकार चलाने के बाद अपनी उपलब्धियों को लेकर वोट मांग रही है। ऐसे में कांग्रेस को सत्ता विरोधी लहर और एनडीए के बिखराव से लाभ मिलने की उम्मीद है। कांग्रेस का मानना है कि चुनाव के बाद भी भाजपा को रोकने के लिए प्रदेश में नये समीकरण बनाए जा सकते हैं। इसी तरह दिल्ली में 15 साल तक सरकार चला चुकी कांग्रेस अब एनसीपी, आरजेडी से शिवसेना को साथ लाने पर विचार कर रही है। ये दल कई सीटों पर कांग्रेस के वोट काटते रहे हैं। इन वोटों का बिखराव रोकने के लिए कांग्रेस चाहती है कि ये दल कांग्रेस का समर्थन करें। कांग्रेस ने दिल्ली में पूर्वांचलियों की संख्या को देखते हुुए भाजपा से आए कीर्ति आजाद को चुनाव प्रचार कमेटी की कमान सौंपकर पूर्वांचल का कार्ड खेला है। भाजपा पहले ही मनोज तिवारी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर यह कार्ड खेल चुकी है। कांग्रेस का मानना है कि दिल्ली में वह तभी मजबूत हो सकेगी, जब आप कमजोर होगी। दोनों का वोट बैंक लगभग एक ही है। ऐसे में कांग्रेस एनसीपी और आरजेडी जैसे दलों को अपने पाले में रखकर अपने बाकी वोट बैंक को बिखरने से रोकना चाहती है।

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