मजबूरी बाउंसर बनने की

मजबूरी बाउंसर बनने की

फरीदाबाद : औद्योगिक नगरी फरीदाबाद में विश्व का प्राचीनतम खेल कुश्ती सिसक-सिसक कर दम तोडऩे को मजबूर है। सरकार व जिला प्रशासन द्वारा इस खेल के लिए कोई सुविधा उपलब्ध नहीं कराने के चलते अखाड़ों से नामचीन पहलवान निकलने बंद हो गये हैं। लेकिन हरियाणा की मिट्टी में रचे-बसे बच्चों की रगों में कुश्ती बहती है और अखाड़ों में पसीने के रूप में बाहर निकलती है। सरकारी नौकरियों के टोटे के चलते इन अखाड़ों से निकलने वाले कुछ पहलवान बाउंसर बनने को भी मजबूर हैं। फरीदाबाद क्योंकि दिल्ली के नजदीक है सो यहां मॉल, नाइट क्लब, पब आदि काफी संख्या में हैं। ऐसे में बाउंसरों की आपूर्ति के माध्यम भी अखाड़े बन रहे हैं। बल्लभगढ़ के प्राचीन पथवारी मंदिर में स्थित जिले के प्रसिद्ध अखाड़े के संचालक बालकिशन कौशिक जो लीलू पहलवान के नाम से प्रसिद्ध हैं, का कहना है,'जनाब, रोजी-रोटी भी तो कमानी है। उन्होंने कहा,' अच्छे बच्चों को तो सरकारी नौकरी मिल जाती है लेकिन बाकी क्या करें। उन्होंने बताया कि जिन बच्चों को सरकारी नौकरी नहीं मिल पाती वह उन्हें सिक्योरिटी एजेंसी में लगवा देते हैं। इनमें से कुछ बाउंसर भी बन जाते हैं। फरीदाबाद के अखाड़ों से निकले जम्भर पहलवान, बेदी पहलवान, धनी पहलवान आदि सरकारी नौकरी न मिलने के कारण बाउंसर के तौर पर  नौकरी कर रहे हैं। इसी प्रकार दिल्ली जसराज अखाड़े के बलवान चंदीला, सुंदर पहलवान, नितिन पहलवान, कृष्ण पहलवान और सुनील पब, मॉल, रेस्टोरेंट तथा सिक्योरिटी सर्विस में काम कर रहे हैं। फरीदाबाद में अखाड़ों में सुविधाओं की कमी की वजह से यहां के पहलवान दिल्ली स्थित अखाड़ों की ओर रुख करने लगे हैं। हालात ये हैं कि अखाड़ों में सुविधाओं की कमी के चलते पहलवान जिम जाने लगे हैं और पहलवानी के थोड़े-बहुत गुर सीखने के बाद कुश्ती में भाग्य आजमाने की बजाय बाउंसर बन अपनी आजीविका कमा रहे हैं। दोहा एशियन गेम कांस्य पदक विजेता नेहा राठी, अंतर्राष्ट्रीय कुश्ती खिलाड़ी नेत्रपाल हुड्डा, सेवानिवृत्त कैप्टन गोपीनाथ, मीर सिंह व रामधन पहलवान के अलावा यहां की मिट्टी से और कोई बड़ा नाम नहीं निकला। औद्योगिक नगरी फरीदाबाद के लोगों का ध्यान वर्ष 2006 में अचानक ही कुश्ती की ओर आकर्षित हुआ। 2006 में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के पहलवान एवं फरीदाबाद पुलिस के सेवानिवृत्त पुलिस अधीक्षक जगरूप राठी की पुत्री  नेहा राठी ने दोहा में आयोजित 15वें एशियन गेम्स में शिरकत की थी तथा कांस्य पदक प्राप्त कर हरियाणा व देश का नाम रौशन किया था। न तो उससे पूर्व और न ही बाद में कोई महिला पहलवान अखाड़े से निकली। हिन्द केसरी ओलम्पिक से कुश्ती हटाने से दुखी : वर्ष 1973 में दिल्ली में आयोजित कुश्ती में नेत्रपाल ने पंजाब के पहलवान मेहरुद्दीन को हरा कर हिन्द केसरी का खिताब जीता था।  ओलम्पिक से कुश्ती को हटाने के प्रस्ताव से नेत्रपाल हुड्डा काफी दुखी हैं। उनका कहना है कि कुश्ती के लिए हमेशा से ही रेगिस्तान समझी जाने वाली फरीदाबाद की धरती से इस निर्णय के बाद से पहलवानों की खेप निकलनी ही बंद हो जाएगी। उन्होंने कहा कि इटली, जापान, मंगोलिया, भारत, रूस, अमेरिका, ईरान जैसे देशों को इस निर्णय के खिलाफ आगे आना चाहिए। जिले का प्रमुख एवं सबसे प्राचीन अखाड़ा  बल्लभगढ़ के प्राचीन पथवारी मंदिर में स्थित है। यह अखाड़ा करीब 50 वर्ष पुराना है। इसका संचालन बाल किशन कौशिक उर्फ लीलू पहलवान व गोपी पहलवान के नेतृत्व में हो रहा है। इस अखाड़े में 15 बड़े पहलवान  तथा 20 कुमारों को प्रशिक्षण दिया जाता है।  जिनमें भोला, राहुल, निशांत पहलवान, अनूप, योगेश शर्मा, नानक, सुरेन्द्र आदि प्रमुख हैं। इसी व्यायामशाला में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन कर चुकी नेहा राठी भी प्रशिक्षण प्राप्त कर चुकी है। वहीं विनोद पहलवान नेशनल जूनियर, सीनियर कुश्ती में भाग ले चुके हैं। महाराणा प्रताप व्यायामशाला :  यह अखाड़ा 12 वर्षों से चल रहा है। इस व्यायामशाला का संचालन जयप्रकाश व वीरपाल पहलवान करते हैं। इस व्यायामशाला में करीब 12 पहलवान प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। इस  में एक कोच है। यहां के जगबीर पहलवान को जिला केसरी का खिताब प्राप्त है तथा हरियाणा ओलम्पिक में तीसरे नम्बर पर रहे हैं। इस अखाड़े के दीपक पहलवान सौ प्रतिशत दे-दनादन साउथ अफ्रीकी प्रतियोगिता में भाग ले चुके हैं। हरीश पहलवान 66 किलोग्राम  में फरीदाबाद में, वजीब पहलवान 76 किलोग्राम  में फरीदाबाद में प्रथम स्थान प्राप्त कर चुके है।  राकेश पहलवान को पूर्व केसरी व जिला कुमार का खिताब भी प्राप्त है। ग्यासीवाला मंदिर व्यायामशाला : यह व्यायामशाला पिछले 60 वर्षों से चल रही है। इस व्यायामशाला को कृष्ण व लक्ष्मण पहलवान चलाते हैं। इसमें करीब 13 पहलवान प्रशिक्षण ले रहे हैं। इससे पूर्व इस व्यायामशाला का संचालन रोहताश पहलवान करते थे जिन्हें जिला केसरी का भी खिताब प्राप्त है। इस व्यायामशाला में प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके पहलवान प्रदेश स्तर पर अच्छा प्रदर्शन कर  चुके हैं। श्री हनुमान मंदिर व्यायामशाला : इस व्यायामशाला की देख-रेख शीशपाल पहलवान पिछले कई सालों से कर रहे हैं। यह व्यायामशाला पिछले 12 वर्षों से चल रही है। इस  में 11 पहलवान प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे है। इसके अलावा गांव झाड़सेंतली में किशन खलीफा व्यायामशाला, गांव फतेहपुर बिल्लोच में सता शिब्बी व्यायामशाला, सेक्टर-2 मुजेड़ी मोड़ पर बलवे पहलवान की व्यायामशाला, मवई रोड पर शिव अखाड़े के नाम से अखाड़े चल रहे हैं।

इनपुट : राजेश शर्मा/कॉपी : अमरनाथ वासिष्ठ

एक बाउंसर का दर्द

तिगांव तहसील के भुआपुर गांव निवासी यशपाल ने जब पहलवानी शुरू की थी तो उन्हें उम्मीद थी कि वह पुलिस या फौज में नौकरी कर देश की सेवा करेंगे परंतु आज उनका मन टूटा चुका है। यशपाल ने कहा कि सरकारी नौकरी के लिये जब भी उन्होंने आवेदन किया, उनकी फिटनेस हमेशा दुरुस्त होती थी लेकिन इंटरव्यू में सिफारिश नहीं होने के कारण उन्हें कभी मौका नहीं मिला। आज उन्हें प्राइवेट सिक्योरिटी में नौकरी करनी पड़ रही है, जिन्हें लोग बाउंसर कहते हैं। उन्हें इस बात का मलाल है कि  लोग बाउंसरों को बदमाश समझते हैं। उन्होंने कहा, 'ऐसा कुछ नहीं है हम भी खानदानी परिवारों से हैं और पारिवारिक प्रतिष्ठा को देखते हुए वह घर के बुजुर्गों की तरह अखाड़े की राह पर उतरे थे।' यशपाल ने बताया कि उनके जैसे कई पहलवान पब, मॉल, सिक्योरिटी में काम कर रहे हैं और जो आथर््िाक तौर पर सक्षम हैं वह या तो अपना जिम चला रहे हैं अथवा बड़े स्तर पर सिक्योरिटी का बिजनेस कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रशासन व सरकार द्वारा सहयोग न मिलने के चलते भविष्य में वह अपने बच्चों व रिश्तेदारों को इस खेल के लिए तैयार नहीं करेंगे क्योंकि जितना खर्चा व मेहनत उन्होंने अपने शरीर को बनाने में लगाई, अगर वह किसी बिजनेस में लगाते तो आज कामयाब बिजनेसमैन होते। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि शारीरिक सौष्ठव के साथ-साथ अच्छी शिक्षा भी ग्रहण करें, ताकि वह उनकी तरह जीवन में संघर्ष करने की बजाय कामयाब हो सकें। यशपाल वसंत विहार, दिल्ली के एक पब में बाउंसर हैं।

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