कभी डंका बजता था सरसाईनगरी का

म्हारे अखाड़े

सिरसा जिले के अखाड़े

सिरसा : पुराने समय में सरसाईनगरी के नाम से मशहूर सिरसा के पहलवानों की धाक दूर तक थी। परंतु आज आलम यह है कि दो दशक पहले जहां सिरसा क्षेत्र में एक दर्जन के करीब अखाड़ों में पहलवान जोर-आजमाइश करते थे, वहीं आज इनकी संख्या घटते-घटते आधा दर्जन से भी कम रह गई है। बचे हुए अखाड़ों में पहलवान अपनी पहचान बनाने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। उन्हें आस है कि एक न एक दिन उनकी पहलवानी का परचम भी जरूर लहराएगा और कुश्ती के क्षेत्र में भी सिरसा का नाम चमकेगा। सिरसा में लगभग आधा दर्जन अखाड़े आज भी चल रहे हैं जिनमें से दो सिरसा शहर व अन्य गांव स्तर पर चल रहे हैं। लगभग आठ दशक से चल रहा अखाड़ा प्रतापगढ़ पहलवान मंगलूराम सैनी व स्वर्गीय कामरेड घनश्याम दास जैसे पहलवानों  ने चलाया था जो वर्तमान में सर्व हितकारिणी सभा द्वारा चलाया जा रहा है। पहलवान सेठ महावीर प्रसाद, पहलवान रामजीलाल, अशोक पहलवान, प्यारेलाल सैनी, प्यारेलाल बाजीगर, मुख्त्यार सिंह सहित अनेक पहलवान इसी अखाड़े में कुश्ती के दाव-पेंच सीख कर शहर का नाम चमका चुके हैं। फिलहाल इस अखाड़े में लगभग 50 से 55 युवक सुबह-शाम पहलवान राजकुमार शर्मा, मोहन सिंह, लीलाधर सैनी व राधेश्याम जैसे पहलवानों से कुश्ती के गुर सीख रहे हैं। इसके अलावा शहर के बरनाला रोड पर एक अन्य अखाड़े मेें पहलवान जगतार सिंह जग्गा भी बच्चों को कुश्ती सिखा रहे हैं। राजकुमार शर्मा उर्फ राजू पहलवान, लीलाधर सैनी व अशोक कुमार जैसे पहलवान प्रदेश व राष्ट्रीय स्तर पर कुश्ती दंगलों में प्रदर्शन कर अनेक मैडल जीत चुके हैं। कामरेड घनश्याम दास भले ही परलोक सिधार चुके हैं लेकिन प्रतापगढ़ अखाड़े में लगे उनके चित्र के समक्ष आज भी पहलवान शीश नवाने के बाद ही कुश्ती का अभ्यास शुरू करते हैं। वहीं रानियां के स्कूल में जोगा सिंह 20 बच्चों को, गांव कोटली में अपने पिता गुरमुख सिंह द्वारा शुरू किए गए श्री गुरू अंगद देव जी अखाड़े में प्रगट सिंह एक दर्जन के करीब बच्चों व बाहिया में अमरपाल सिंह गिल श्री बाला जी कुश्ती अखाड़े में 10 से 12 पहलवानों  को कुश्ती के गुरसिखा रहे हैं। इसके अलावा स्कूली स्तर पर बाहिया, डिंग मंडी, रानियां व कुताबगढ़ में भी बच्चों को कुश्ती की टे्रनिंग दी जाती है। नगराना के पहलवान अमरजीत सिंह अमर,  रानियां के जगतार सिंह, डाबर सिंह सहित अनेक खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन कर प्रदेश व जिला स्तर पर मैडल प्राप्त कर चुके हैं। डाबर सिंह ने सिरसा केसरी का खिताब भी हासिल किया। सिरसा के प्रतापगढ़ अखाड़े में बच्चों को कुश्ती की शिक्षा देने वाले पहलवान राधेश्याम का कहना है कि प्रतापगढ़ अखाड़े की स्थापना 1947 में हुई जिसे कामरेड घनश्याम दास चलाते थे। कामेरड घनश्याम दास  ने इस अखाड़े में अशोक कुमार जैसे दिग्गज पहलवान तैयार किए। कामरेड घनश्याम दास के निधन के बाद इस अखाड़े की बागडोर अशोक कुमार पहलवान के हाथों में आई। इस अखाड़े के विकास कुमार ने तीन बार जिला में प्रथम स्थान प्राप्त किया। प्रतापगढ़ अखाड़े के कोच एवं महाराजा अग्रसैन स्कूल में कार्यरत राजकुमार शर्मा उर्फ राजू पहलवान कहते हैं कि सिरसा में लगभग आधा दर्जन अखाड़े सरकार की अनदेखी के कारण बंद हो चुके हैं। उन्होंने बताया कि दो दशक पूर्व  सिरसा में सरसाईनाथ अखाड़ा, अखाड़ा खैरपुर, अखाड़ा खाजाखेड़ा, महावीर दल अखाड़ा, ऐलनाबाद अखाड़ा सहित अनेक अखाड़े चलते थे जो सरकार की अनदेखी के कारण बंद हो गए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर हरियाणा का कुश्ती में अच्छा प्रदर्शन होने तथा कुश्ती व अन्य खेलों के कारण बच्चों को रोजगार मिलने से उनका रुझान इन परम्परागत खेलों की तरफ बढ़ा लेकिन इन अखाड़ों तक सरकारी सुविधाएं न पहुंचने से अनेक खिलाड़ी कुश्ती जैसे खेलों को छोड़ गए हैं। उन्होंने बताया कि प्रतापगढ़ अखाड़ा लगभग 80 वर्ष पुराना है लेकिन इस अखाड़े में अभी तक किसी प्रकार की सरकारी सुविधा नहीं है। न ही इस अखाड़े में पानी का प्रबंध है, न खेलने के लिए मैट और न ही शैड की व्यवस्था है जिसके कारण बरसात के दिनों में खिलाडिय़ों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि अगर सरकार अखाड़ों को कुछ सुविधाएं दे दे तो यहां के पहलवान भी अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं। उनका कहना है कि प्रदेश, राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कुश्ती मैट पर होती है लेकिन उनके पहलवान मिट्टी पर अभ्यास करते हैं।

सिरसा में हर वर्ष होती थी कुश्ती प्रतियोगिता

हरियाणा रैसलिंग एसोसिएशन के प्रधान व राष्ट्रीय स्तर कुश्ती खिलाड़ी लीलाधर सैनी का कहना है कि एसोसिएशन हर वर्ष सिरसा में दंगल करवाती थी जिसमें सिरसा जिला के साथ-साथ प्रदेश व अन्य राज्यों के पहलवान अपना दमखम दिखाते थे लेकिन सुविधाओं के अभाव में यह बंद हो गए हैं। अब सिरसा में सर्वहित कारिणी सभा के प्रधान बद्री प्रसाद की ओर से प्रतापगढ़ अखाड़ा में पहलवान अभ्यास कर रहे हैं। उनका कहना है कि ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए हरियाणा के अनेक खिलाडिय़ों ने देश को पदक दिलाए हैं, ऐसे में कुश्ती को ओलंपिक से खत्म करने की कोशिशें सही नहीं हैं। उन्होंने  सिरसा के स्टेडियम में कुश्ती का कोच नियुक्त करने और अखाड़ों में मैट व शैड की व्यवस्था करने की मांग की है।

सुशील कुमार के साथ किया था अमर ने मुकाबला

सन् 2009 में कंधे की चोट के बाद कुश्ती से अलविदा कहने वाले जिला के नगराना से अमरजीत सिंह उर्फ अमर को देश के नंबर एक खिलाड़ी सुशील कुमार से भिडऩे का मौका मिला और वह दूसरे नंबर पर रहे। उनके पिता मुख्त्यार सिंह ने बताया कि एक बार उनके बेटे का राज्य स्तर की अंडर-19 प्रतियोगिता में देश के कुश्ती के हीरो कहे जाने वाले खिलाड़ी सुशील कुमार से मुकाबला हुआ और अमर को हारने के बाद सिल्वर मैडल मिला।  6 फुट के अमर ने सिरसा का नाम अनेक बार चमकाया। अमर ने हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर में हर वर्ष होने वाली प्रतियोगिता में हिमाचल केसरी का खिताब जीता। वह सिरसा के मंगाला में हर वर्ष बाबा भूमण शाह के मेले पर होने वाले दंगल में तीन बार जीता। अमर पंजाब के आनंदपुर साहिब, फगवाड़ा, खन्ना सहित अनेक प्रतियोगिताओं में दूसरे नंबर के खिलाड़ी के नाम से जाना जाता था। अमर हिन्दुस्तान ही नहीं पाकिस्तान के नामचीन पहलवानों से भी भिड़ चुका है। फरवरी, 2008 में बाबा कन्हैया लाल संगीत एंड कल्चरल महासभा, होशियारपुर द्वारा हर वर्ष की भांति करवाए जाने वाले कुश्ती मुकाबले में अमर का मुकाबला पाकिस्तान के पहलवान मोहम्मद उमर से भी हुआ था। वर्ष 2003 में अमर ने प्रदेश स्तरीय प्रतियोगिता जीती। इसके अलावा वर्ष 2005 में दिल्ली नेशनल कुश्ती प्रतियोगिता में दूसरा स्थान हासिल किया। लेकिन वर्ष 2009 में अमर ने कंधे में चोट लगने के बाद कुश्ती को अलविदा कह दिया। मुख्तयार सिंह ने बताया कि उनके परिवार को कुश्ती की लगन है और छबेग सिंह कोटली पहलवान को अपना गुरु मानते हैं।

ओलंपिक से कुश्ती को निकालने की सिफारिश से टूटा मनोबल

सिरसा के प्रतापगढ़ अखाड़े में लगभग डेढ़ वर्ष से अभ्यास कर रहे जिला स्तर पर स्वर्ण पदक विजेता बी. कॉम. के छात्र श्रीराम, दो वर्ष से कुश्ती का अभ्यास कर रहे दस जमा दो के छात्र विकास, रविकुमार, संदीप कुमार (हैप्पी), नवीन कुमार, रोहताश सहित अनेक युवा पहलनवानों का कहना है कि कुश्ती को ओलंपिक से बाहर करने की सिफारिश से युवाओं का मनोबल गिरा है। क्योंकि उनका लक्ष्य भी कुश्ती के हीरो सुशील कुमार व योगेश्वर दत्त की भांति ओलंपिक में देश का नाम रौशन करने का था। केन्द्र सरकार को अन्य देशों के साथ मिलकर कुश्ती को ओलंपिक से बाहर करने का विरोध करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो प्रदेश के बच्चों को पहलवान बनने की सोच को बलदना पड़ेगा जिससे प्रदेश में अखाड़ों की चमक गायब हो जाएगी।

रिटायरमेंट के बाद अखाड़ा खोलने की तमन्ना

रानियां के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक स्कूल में डीपीई के पद पर कार्यरत जोगा सिंह राष्ट्रीय व प्रदेश स्तर पर गोल्ड मैडल अपने नाम कर चुके हैं। उन्होंने 1985 में आयोजित ऑल इंडिया सिविल सर्विसिज प्रतियोगिता में स्वर्ण, 1989 में वाराणसी में आयोजित द्रोणाचार्य प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक के अलावा राज्य स्तर पर भी अनेक पदक अपने नाम किए हैं। उन्होंने महाराष्ट्र में मजीर पहलवान को पटखनी देकर स्वर्ण पदक हासिल किया था। जोगा सिंह स्कूल मेंछात्रों को कुश्ती सिखाते हैं। इसी माह सेवानिवृत्त होने के बाद उनका मन अखाड़ा खोल कर क्षेत्र के युवाओं को कुश्ती के लिए जागरूक करने का है। वह अपने खेत में अखाड़ा लगाकर बच्चों को कुश्ती के दाव-पेंच सिखाएंगे। जोगा सिंह की पुत्रवधू सर्वजीत कौर भी कुश्ती, कबड्डी, जूडो, सैंवों व कराश पांच खेल खेलती है और उनका पुत्र सर्वजीत सिंह जूडो का खिलाड़ी रहा है।

पहलवान सर्वजीत पांच बार बनी जूडो की नेशनल चैम्पियन

लड़कों की पहलवानी देख जिला की लड़कियां भी पीछे नहीं हैं। पहलवान जोगा सिंह की पुत्रवधू सर्वजीत कौर पिछले दस वर्षों से कुश्ती के अलावा चार अन्य खेलों भी भाग ले रही है।  सर्वजीत कौर बाजवा ने कुश्ती तथा जूडो के गुर सिरसा में अग्रसैन स्कूल के कोच रहे ओमप्रकाश से सीखे। सर्वजीत ने कुश्ती में तो महारथ हासिल कि ही, वह जूडो, सैंवों, कुराश व कबड्डी में भी पीछे नहीं है। सर्वजीत ने पंचकूला, भिवानी व जींद में आयोजित हरियाणा ग्रामीण खेलकूद प्रतियोगिता के कुश्ती मुकाबलों में भाग लिया और जींद में तीसरे नंबर की खिलाड़ी बनी। इसके साथ सर्वजीत वर्ष 2008 से 2012 तक पांच बार जूडो की नेशनल चैंपियन बनी। रोहतक में आयोजित कुराश प्रतियोगिता में गोल्ड मैडल हासिल किया। वहीं वर्ष 2013 में जम्मू-कश्मीर में हुई सेम्बो प्रतियोगिता में भाग लिया। इसके अलावा वह जिला व प्रदेश स्तर की कबड्डी प्रतियोगिताओं में भी भाग लेती रहती है। सर्वजीत का कहना है कि परिवार के सहयोग से वह समय निकाल कर खेलों में भाग लेती है।

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