होंगे कामयाब

बुलंद हौसलों की उड़ान जारी भले ही महत्वाकांक्षी चंद्रयान मिशन-दो के ऑर्बिटर से अलग होकर लैंडर विक्रम शनिवार को उम्मीदों के मुताबिक न उतर पाया हो, मगर अंतरिक्ष में सफलता की नयी इबारत लिखने की उम्मीदें कम नहीं हुई हैं। ऑर्बिटर पूरी तरह से काम कर रहा है जो नब्बे फीसदी सफलता को दर्शाता है। रविवार को खबर आई कि ऑर्बिटर में लगे ऑप्टिकल हाई रेजोल्यूशन कैमरों ने विक्रम लैंडर की तस्वीर ली है, जो निर्धारित लक्ष्य से पांच सौ मीटर की दूरी पर औंधे गिरा है। ऑर्बिटर के जरिये लैंडर से संपर्क साधने की कोशिश की जा रही है। लैंडर और रोवर का जीवन पृथ्वी के हिसाब से चौदह दिन का है और इस बीच इसरो संपर्क साधने का प्रयास करता रहेगा। यह बात अलग है कि महत्वाकांक्षी चंद्रयान मिशन उम्मीदों के अनुरूप चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतर नहीं पाया। भारत ने पहले ही चुनौतीपूर्ण लक्ष्य रखा था। दक्षिणी ध्रुव पर दुनिया का कोई भी देश सॉफ्ट लैंडिंग नहीं करा पाया था क्योंकि यह एक बेहद मुश्किल लक्ष्य था। इसके बावजूद ऑर्बिटर के निर्धारित एक साल से अधिक तक काम करते रहना बड़ी उपलब्धि है। चंद्रयान की 47 दिन की यात्रा  उपलब्धियों भरी रही है लेकिन लंबी तैयारी, मेहनत और खर्च के बावजूद मिली असफलता से निराशाभाव का जागना सहज मानवीय प्रवृत्ति है। निराशा के इन पलों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक अभिभावक के तौर पर वैज्ञानिकों का जिस तरह मनोबल बढ़ाया, उसे देश-दुनिया ने देखा। प्रधानमंत्री वैज्ञानिकों की उपलब्धि देखने और हौसला बढ़ाने बेंगलुरु स्थित इसरो मुख्यालय में मौजूद थे। लैंडर विक्रम के लक्ष्य के मुताबिक न उतर पाने पर उन्होंने इसरो चेयरमैन डॉ. सिवन का ढांढस बंधाया, जिसे पूरी दुनिया ने देखा। एक प्रेरक व प्रभावशाली संबोधन में मोदी ने कहा कि पूरा देश वैज्ञानिकों के साथ खड़ा है। हमारे अंतरिक्ष कार्यक्रम का सर्वश्रेष्ठ आना बाकी है, देश को वैज्ञानिकों पर पूरा भरोसा है। उन्होंने वैज्ञानिकों को मक्खन नहीं, पत्थर पर लकीर खींचने वाला बताया। अपने प्रेरक संबोधन में मोदी ने कहा कि हर मुश्किल, हर संघर्ष, हर कठिनाई हमें कुछ नया सिखाकर जाती है। कुछ नये आविष्कारों, नयी तकनीक के लिये प्रेरित करती है। विज्ञान ज्ञान का सबसे बड़ा शिक्षक है। विज्ञान में विफलता कुछ नहीं होती, केवल प्रयास और प्रयोग होते हैं। चंद्रयान अभियान के लिये बिना रुके एक सप्ताह से काम में लगी टीम अगले मिशन की तैयारी में जुट गई है। डॉ. सिवन ने कहा भी है कि जो कुछ हुआ, उससे इसरो की भविष्य की नीतियों पर इसका कुछ असर नहीं पड़ेगा। इसरो के महत्वाकांक्षी गगनयान की तैयारियों का कार्यक्रम 2020 तक खत्म होगा  और 2022 तक भारत गगनयान के जरिये अंतरिक्ष यात्री भेजगा। नि:संदेह प्रधानमंत्री और देश के लोग जिस तरह इसरो के वैज्ञानिकों के साथ डटे रहे, उससे पूरी दुनिया में यह संदेश गया कि हम जहां वैज्ञानिकों की उपलब्धियों पर गर्व करते रहे हैं तो मुश्किल वक्त में भी डटकर उनके साथ खड़े रहते हैं।

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