हीरो

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बाल कहानी

इंद्रजीत कौशिक

‘दिनेश चल आ। हम दोनों चलकर मैदान में रेस लगाते हैं।’ कार्तिक अपने दोस्त से बोला तो उसने इनकार में सर हिला दिया। कार्तिक ने बहुत कहा, पर दिनेश नहीं माना तो नहीं ही माना। मजबूर होकर उसे किसी दूसरे दोस्त की तलाश में जाना पड़ा। दिनेश के साथ यही समस्या थी। असल में 12 साल का दिनेश हमेशा किसी गतिविधि में शामिल होने से कतराता रहता था। गतिविधि चाहे शारीरिक हो या मानसिक। स्कूल के एनुअल फंक्शन में भी वह यह सोचकर शामिल नहीं होता था कि कहीं लोग उस पर हंसने न लगे। दिनेश को उसके मम्मी पापा और टीचर बहुत प्रेरित करते थे, पर वह न जाने किस मिट्टी का बना था कि मानता ही नहीं था। हालांकि उसे खेल और दूसरे कंपटीशन को देखने का बहुत शौक था। उस दिन दिनेश को पता चला कि उसके स्कूल की टीम और दूसरे स्कूल की टीम के बीच फुटबॉल का मैच होगा। वह खुद को रोक नहीं पाया और दर्शकों के बीच में सबसे आगे जाकर बैठ गया। मैच की शुरुआत में ही दूसरी स्कूल की टीम ने गोल दाग दिया। अपने स्कूल को पिछड़ते देख, दिनेश का मुंह उतर गया। दिनेश अपने स्कूल की टीम का हौसला बढ़ाने के लिए खड़ा होकर ताली बजाने लगा। दिनेश के स्कूल की टीम ने गोल किया तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। लेकिन अगले ही मिनट में प्रतिद्वंद्वी टीम ने फिर गोल दाग दिया। ऐसे ही रोमांचक मुकाबले के बीच अचानक दिनेश के स्कूल की टीम का खिलाड़ी घायल हो गया। उसे मैदान से बाहर जाना पड़ गया। उसकी जगह पर जिस एक्स्ट्रा खिलाड़ी को आना था उसकी तबीयत भी अचानक खराब हो गई। ऐसे में दिनेश के स्कूल की टीम में खलबली मच गई। टीम के कोच की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। तभी उनकी निगाह दर्शकों में आगे बैठे दिनेश पर चली गई। उन्होंने इशारे से दिनेश को अपने पास बुलाया। ‘सर यह कैसे हो सकता है, मैंने आज तक कभी फुटबॉल खेला ही नहीं। ऐसे में मैं भला मैच में क्या कर पाऊंगा?’ ‘मैं जानता हूं बेटा। पर साथ में यह भी जानता हूं कि तुम्हें फुटबॉल का मैच देखने का बड़ा शौक है। तुम मैच के हर पहलू पर बहुत बारीकी से निगाह रखते हो। मुझे पूरा यकीन है कि तुम इस मैच में अपना जौहर दिखाओगे और अपने स्कूल की टीम का नाम रोशन करोगे। यह मत भूलो कि यह तुम्हारे स्कूल की इज्जत का सवाल है।’ कोच ने दिनेश की आंखों में झांकते हुए कहा तो अपने स्कूल की इज्जत का ख्याल आते ही दिनेश ने अपना इरादा बदल लिया। ‘सर मैं तैयार हूं। मैं खेलूंगा।’ दिनेश की आंखों में तैरते आत्मविश्वास को देखकर कोच मुस्कुरा दिए। कुछ ही देर में घायल खिलाड़ी की जगह लेने के लिए दिनेश पूरे दमखम के साथ मैदान पर था। ‘सर! आपने दिनेश को टीम में शामिल क्यों किया? इसे तो खेलना ही नहीं आता। यह खेला तो हमारी हार निश्चित है।’ टीम के सदस्यों ने कोच से कहा। कोच ने बच्चों को समझाया। उधर, दिनेश ने इसे चुनौती के रूप में ले लिया। खेल दोबारा शुरू हुआ तो पहले 1 मिनट में ही दिनेश ने पूरी ताकत के साथ फुटबॉल को प्रतिद्वंद्वी के गोल में डाल दिया। इस तरह एक-एक करके उसने तीन गोल ठोक दिए। नए खिलाड़ी का खेल देखकर प्रतिद्वंद्वी टीम हक्की-बक्की रह गई। मैच देखने वाले भी भी दंग रह गये। ‘हमें इस नए लड़के को रोकना होगा वरना हम हार जाएंगे।’ प्रतिद्वंद्वी टीम के कैप्टन ने अपने साथियों से उसे सबक सिखाने को कहा। उनके एक खिलाड़ी ने जानबूझकर फुटबॉल को दिनेश के सर से टकराया तो वह मैदान पर गिर पड़ा। लेकिन दिनेश ने हिम्मत नहीं हारी। वह पूरी ताकत के साथ उठ खड़ा हुआ। उसका जोश और जज्बा रंग लाया। वह दोगुनी ताकत और जोश के साथ खेल में अपना जौहर दिखाने लगा। अब मैच दिनेश के स्कूल की टीम जीत चुकी थी। उसके खिलाड़ियों ने दिनेश को अपने कंधों पर बिठाया और विजयी जुलूस के रूप में पूरे मैदान का चक्कर लगाने लगे। दर्शकों का उल्लास देखकर दिनेश फूला नहीं समा रहा था। दिनेश अब पूरे स्कूल का हीरो बन चुका था। अध्यापकों ने उसकी तारीफों के पुल बांध दिए। इस घटना के बाद दिनेश अब पूरी तरह बदल चुका था। किसी भी खेलकूद प्रतिस्पर्धा से कतराने वाला दिनेश अब आगे बढ़ चढ़कर उन में हिस्सा लेने लगा था। खुद दिनेश भी अपने भीतर आए इस परिवर्तन से बहुत खुश था। उसमें आए परिवर्तन से उसका दोस्त कार्तिक बहुत खुश हुआ। ‘मेरे दोस्त जीवन में जीत का एक ही मंत्र है उत्साह और तैयारी के साथ फील्ड में उतर जाओ तो सफलता अवश्य मिलती है।’ उसने दिनेश की पीठ थपथपाते हुए कहा।

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