हिंदी फीचर फिल्म हुमायूं

फ्लैशबैक शारा फिल्म न होकर हुमायूं मूवी बॉलीवुड का ऐतिहासिक महाकाव्य थी जो 1945 में रिलीज़ हुई थी और इसे निर्देशित किया था महबूब खान ने। इससे पहले भी बॉलीवुड में ऐतिहासिक फिल्में बनीं लेकिन इसके निर्देशन के नोट्स इतने बढ़िया थे कि हॉलीवुड का भी इस फिल्म ने बनने से पूर्व ही ध्यान खींच लिया। यही वजह थी कि हॉलीवुड के सिसिल बी. महबूब खान के निर्देशन में सहयोग देने के लिए स्वयं आगे आये। फिल्म के सेट, कॉस्ट्यूम्ज तथा कला-निर्देशन इतने कमाल के थे कि शायद ही इतने खूबसूरत सेट बाद की ऐतिहासिक फिल्मों में दिखे हों। इतिहास वैसे भी यथार्थ व कथा-कहानियों का फ्यूजन ही तो है। 1500 शताब्दी की बात अगर 1945 में की जा रही हो तो उसमें फ्यूजन इस कदर किया गया है कि फिल्म एक मास्टर-पीस बन गयी । दर्शकों ने भी हाथोंहाथ लिया। उस साल की सबसे ज्यादा मुनाफा बटोरने वाली यह सातवीं फिल्म बन गयी। खूब हिट हुई फिल्म के लोग महबूब खान के मुरीद हो गये। सबसे कमाल का किरदार निभाया वीना ने। साम्राज्ञी योद्धा की बुलंद आवाज़ ने सारे किरदारों को अपने आगे बौना कर दिया लेकिन हुमायूं की प्रेमिका का किरदार निभाने के लिए जिस चेहरे की ज़रूरत थी, महबूब खान किरदारों के चयन में गच्चा खा गये। नरगिस खूबसूरत थीं लेकिन तब उनकी उम्र महज़ 16-17 साल ही रही होगी। किरदार निभाने के लिए अभिनय में जिस गंभीरता की ज़रूरत थी, वह नदारद दिखी। शायद इसलिए कि हुमायूं उसकी तीसरी फिल्म थी। अभिनय में फिसड्डी दूसरे कलाकार चंद्रमोहन थे। हुमायूं के पात्र को जैसे जीया जाना चाहिए वैसा अशोक कुमार ने जीया। यही बात शाह नवाज़ और के.एन. सिंह के बारे में कही जा सकती है। कुल मिलाकर हुमायूं एक अच्छी ऐतिहासिक फिल्म बनी है, जिसमें बेहद खूबसूरत संगीत है, दिल को छूने वाले गीत हैं, बढ़िया सेट हैं। चुटीले संवादों की वजह से दर्शक भारी-भरकम इतिहास की कहानी को ऐसे देखता है जैसे कोई विशुद्ध रोमांटिक मूवी हो। कहानी भी कम दिलचस्प नहीं। फिल्म शुरू ही बाबर की सिकंदर लोधी के साथ पानीपत की लड़ाई से होती है, जिसमें सिंकदर लोधी बाबर से हार जाता है और बाबर का कब्जा सिंकदर लोधी के इलाके पर हो जाता है। अपनी विजय पर इठलाया बाबर जब अन्य इलाकों को विजय करने के लिए निकलता है तो उसके विजयी लश्कर को एक रियासत की राजकुमारी (वीना) चुनौती देती है। राजकुमारी के शौर्य व हौसले को देखकर बाबर (शाह नवाज़) इतना प्रभावित होता है कि वह उसे अपनी बेटी बना लेता है और बढ़ते मुगलिया प्रभाव को देखकर राजकुमारी भी इसी में अपनी खैर मानती है। बाबर बदले में उसे उसका साम्राज्य लौटा देता है। राजकुमारी द्वारा बाबर को पिता समान दर्जा देना तथा उसके बेटे हुमायूं को राखी बांधना उसके सेनापति जय सिंह (के.एन. सिंह) को नागवार गुज़रता है और यही बात राजकुमारी के मंगेतर रणधीर (चंद्रमोहन) को भी। क्योंकि उनके मुताबिक यह राजूपत सिद्धांतों के खिलाफ है। कहानी आगे बढ़ती है तो हुमायूं हमीदा बानो (नरगिस) की अदाओं पर मर-मिटता है और बाकायदा शादी करना चाहता है। हमीदा मना करती है ‘कभी हां कभी ना’ के काफी सीन चलते हैं, गाने-गीत भी चलते हैं। जी हां, ‘रस्मे-उल्फत को निभाएं तो निभाएं कैसे?’ इसी फिल्म का गाना है। इसी बीच बाबर बीमार होकर मर जाता है और हुमायूं मुगलिया सल्तनत का बादशाह बन जाता है। एक हमले में दिल्ली उसके हाथ से चली जात है और वह वापस ईरान चला जाता है। जहां हमीदा से शादी करके अकबर का बाप बनता है। वह वापस अपनी गद्दी प्राप्त के लिए पहले काबुल को फतेह करता है, फिर लाहौर, फिर आगरा और अंत में दिल्ली। इस फिल्म की अधिकांश शूटिंग जयपुर के महलों में हुई है। निर्माण टीम निर्देशक : महबूब खान कथाकार : आगाजानी कश्मीरी पटकथा : आगाजानी कश्मीरी मूलकथा : प्रो. वाकिफ मुरादाबादी संगीत : गुलाम हैदर गीत : पंडित मधुर, अंजुम, आरजू, विकर अम्बालवी सिनेमैटोग्राफी : फरदून ईरानी सितारे : अशोक कुमार, वीना, नरगिस, के.एन. सिंह, चंद्रमोहन

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