हिंदी फीचर फिल्म हाथी मेरे साथी

फ्लैशबैक

शारा हुआ यूं कि राजेश खन्ना एक दिन सलीम खान के पास आये। यह उस वक्त की बात है जब सलीम खान की कहानियां बनी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर हिट-दर-हिट साबित हो रही थीं और खन्ना साहिब के बारे में तो तब यही कहा जाता था कि ऊपर आका नीचे काका (राजेश खन्ना का दूसरा नाम) यानी वह अब तक लगातार 16 हिट फिल्में दे चुके थे और सभी फिल्में एक अदद हीरो के नुस्खे से चली थी (अगर मर्यादा व अंदाज फिल्में छोड़ दें तो)। राजेश खन्ना ने सलीम से कहा कि दक्षिण भारतीय एम.एम.ए. चिपन्ना थेवर से इतना एडवांस पैस ले चुके हैं कि जिसकी बदौलत से वह आशीर्वाद बंगला खरीद सके हैं, मगर चिनप्पा थेवर की एक शर्त है कि वह तमिल में बनी दीवा चेयल नामक अपनी मूवी को हिंदी में भी बनाना चाहते हैं, जिसमें हीरो राजेश खन्ना को लेना चाहते हैं। 1967 में बनी दीवा चेयल पहले तमिल में सुपरहिट हो चुकी थी। चिनप्पा थेवर के बारे में पाठकों को बता दूं कि वह दक्षिण भारतीय फिल्मों के प्रोड्यूसर और डायरेक्टर हैं और देवर फिल्म्ज प्रोड्क्शन कंपनी के मालिक हैं। फिल्म का मसौदा पढ़कर सलीम खान ने साफ इनकार करते हुए कहा कि मैं ऐसी स्क्रिप्ट नहीं लिख सकता जो इतनी फिजूल हो लेकिन राजेश खन्ना का कहना था कि पटकथा की मूलकथा काफी अच्छी है प्लीज इसके बारे में विचार किया जाये, अगर पटकथा अच्छी लिखी गयी तो नाम और दाम दोनों हमारी मुट्ठी में होंगे। वैसे भी यह फिल्म तो मुझे (राजेश खन्ना) करनी ही पड़ेगी क्योंकि बंगला खरीदने के लिए मुझे पैसे की सख्त ज़रूरत है। सलीम खान मान गये क्योंकि जावेद ने भी तब जोर डाला था। वह उनके ही दफ्तर में बैठे थे। दोनों ने मिलकर पटकथा को दोबारा लिखा और पाठक जानते ही हैं इस फिल्म ने देश और विदेशों से कैसी धूम मचायी। तब ही उसने 16.35 करोड़ का विशुद्ध मुनाफा कमाया जो आजतक 475 करोड़ रुपये के बराबर है। विदेशों में भी फिल्म ने कामयाबी के झंडे गाड़े। सोवियत यूनियन में यह फिल्म ब्लाकबस्टर साबित हुई, जहां 34.8 मिलियन टिकटें बिकीं। राजकपूर की फिल्म के बाद बॉक्स ऑफिस पर किसी भारतीय फिल्म की पहली सफलता था। नतीजा यह हुआ कि सलीम-जावेद की जोड़ी पटकथा लेखन के क्षितिज में आ उतरी और हिट पर हिट देने लगी। बेशक बाद में उन्होंने अमिताभ बच्चन की एंग्रीमैन की इमेज को अपने चुटीले संवादों और पटकथा की बदौलत खूब चमकाया। लेकिन इस जोड़ी का डेब्यू हाथी मेरे साथी से ही हुआ था। इसके निर्माण की 40वीं वर्षगांठ पर टाइम्ज ऑफ इंडिया ने लिखा था कि बच्चों के लिए बॉलीवुड में अभी तक ऐसी अन्य कोई फिल्म नहीं बनी और यह बात सौ फीसदी सच है। काजोल तो फिल्म हाल में ही चीख पड़ी थी जब तनुजा अपनी दोनों बेटियों को फिल्म दिखाने ले गयी थीं। ‘मम्मी तुमने हाथी को मार डाला’—गुस्से में काजोल ने अपनी मम्मी (तनुजा जो फिल्म की नायिका थी) को कहा था। उनकी छोटी बेटी तनीषा तो उनसे नाराज ही हो गयी थीं। पहले पहल तो तनुजा हाथियों से डरती थी लेकिन बाद में उनसे वे दोस्ताना हो गये। यहां तक कि बच्चे के पास सांप आता देखकर जब तनुजा को धक्का देना था तो रामू नामक हाथिन ने धक्का देने से इनकार कर दिया। निर्देशक सिर पीटते रहे लेकिन हाथिन टस से मस नहीं हुई और इनकार में सिर हिला दिया। इसकी कामयाबी से उत्साहित होकर थेवर ने 1972 में इसी फिल्म को नल्ला नराम के नाम से दोबारा तमिल में बनाया। जब राजेश खन्ना का फिल्म में हाथी मर जाता है तो उनके द्वारा गाया गीत ‘नफरत की दुनिया’ को लेकर मतभेद हो गये थे। संगीतकार प्यारेलाल इस गीत को उदास गीत बताकर फिल्म में नहीं रखना चाह रहे थे, लेकिन राजेश खन्ना व निर्देशक इसे फिल्म में रखने के पक्ष में थे। लेकिन आनंद बख्शी द्वारा लिखे गये इस गीत को जब रफी ने गाया तो हॉल में बैठक दर्शक रो पड़े। बेसहारा राजू (राजेश खन्ना) अपने चार हाथियों के साथ गली-गली तमाशा दिखाकर अपनी जीविकोपार्जन करता है। राजू को इन जानवरों से इसलिए प्यार हो गया क्योंकि उन्होंने एक दिन राजू की जान एक सांप से बचाई थी। उसके बाद वे साथ ही रहने लगे। उनकी कमाई से राजू ने प्यार की दुनिया नामक चिड़ियाघर बना लिया, जिसमें शेरों से लेकर हर तरह के जानवर थे। इसी दौरान वह तनु (तनुजा) से मिलता है और उसके प्यार में पड़ जाता है। चूंकि तनु के डैडी रतनलाल (मदनपुरी) काफी अमीर व्यक्ति हैं, इसलिए शुरुआत में रिश्ते को लेकर ना नुकुर होती है। लेकिन बाद में वे दोनों शादी के बंधन में बंध जाते हैं, लेकिन राजू के जानवरों से बेहद मेलजोल से तनु उपेक्षित-सी अनुभव करती है। उपेक्षा, भय और भी बुरा रूप अख्तियार कर लेती है जब तनु के यहां बच्चा होता है। बच्चे को जानवरों से नुकसान के भय से तनुजा राजू को दोनों में से एक को चुनने के लिए कहती है। जब राजू अपने परिवार के मुकाबले जब जानवरों को चुनता है तो रामू नामक हाथी दो बिछुड़े पति-पत्नी को मिलाने की ठान लेता है, लेकिन सरवन कुमार (के.एन. सिंह) की गोली का शिकार रामू दोनों को मिलाने की खातिर अपनी जान दे देता है। गीत चल चल मेरे हाथी : किशोर कुमार दिलवर जानी चली हवा मस्तानी : लता मंगेशकर, किशोर कुमार मेहरबानो कद्रदानो : किशोर कुमार सुन जा आ ठंडी हवा : लता मंगेशकर, किशोर कुमार नफरत की दुनिया को छोड़कर : मोहम्मद रफी धक धक कैसे चलती है गाड़ी : लता मंगेशकर, किशोर कुमार

निर्माण टीम निर्देशक : एम.ए. थिरूमुगम प्रोड्यूसर : सैंडो एम.एम. ए चिनप्पा थेवर पटकथा : सलीम-जावेद संवाद : इंद्रनाथ आनंद मूलकथा : एम.एम. चिनप्पा थेवर गीतकार : आनंद बख्शी संगीतकार : लक्ष्मीकांत प्यारेलाल सिनेमैटोग्राफी : के.एस. प्रसाद सितारे : राजेश खन्ना, तनुजा, के.एन. सिंह, मदनपुरी आदि

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