हिंदी फीचर फिल्म हमराही

हिंदी फीचर फिल्म हमराही

फ्लैशबैक शारा अलग-अलग विषयों पर इस नाम से तीन बार फिल्में बनीं। पहली 1945 में, दूसरी 1963 में तथा तीसरी 1974 में, जिसमें राज कपूर के बड़े साहबजादे रणधीर कपूर के साथ तनुजा थी। यह तब का वक्त था जब बॉलीवुड में इस उम्र के काफी सारे सितारों की संतानें अभिनय को करियर बना रहे थे। चुप चुप क्यों बैठी हो, हम भी अकेले और तुम भी अकेले हो, इसी फिल्म का गाना है जो उस दौर के कॉलेज गोइंग में खासा लोकप्रिय था। फिल्म ठीक-ठीक ही थी लेकिन तत्कालीन युवा वर्ग ने काफी पसंद किया था। इससे पूर्व इसी नाम पर 1945 में जो फिल्म बनी थी, उसे समीक्षकों की और फिल्मी पत्रिकाओं में खूब वाह-वाही मिली। 1945 में निकले फिल्म इंडिया नामक पत्रिका ने इस फिल्म को पढ़े-लिखे लोगों की फिल्म बताया। यह फिल्म निर्देशन, संवाद और कहानी के लिहाज से काफी उम्दा थी। इसी फिल्म के जरिए बिमल रॉय हिंदी फिल्मों में निर्देशन के क्षेत्र में उतरे थे। यह फिल्म पहले बांग्ला भाषा में भी बन चुकी थी, जिसे भी निर्देशित बिमल दा ने किया था। उस समय इसकी पटकथा काफी प्रगतिशील मानी गयी थी क्योंकि उस समय आज़ादी के दीवाने ब्रिटिश राज की चूलें हिलाने के लिए तत्पर थे और तब फिल्मों से बेहतर और कौन-सा जरिया था? इसी फिल्म में पहली बार रवीन्द्र नाथ टैगोर की कविता ‘जन गण मन अधिनायक जय हे’ को गीत के तौर पर शामिल किया गया था जो बाद में राष्ट्रगान बन गया। इसे न्यू थियेटर कलकत्ता की ओर से प्रस्तुत किया गया, बिल्कुल नये चेहरों के साथ, मगर बिमल की निर्देशन पर पकड़ इतनी थी कि फिल्म चल निकली। यह फिल्म कामयाब थी, लेकिन फ्लैश बैक की आलोच्य फिल्म में इस बार हम बात करेंगे 1963 में रिलीज टी. प्रकाश राव की हमराही की, जिसमें सितारे थे राजेंद्र कुमार और राजेंद्रनाथ, महमूद के अलावा एक चर्चित चेहरा भी था जमुना का जो बॉलीवुड की उन दशकों में बनी सती अनसुया जैसी धार्मिक फिल्मों की हीरोइन थी। हालांकि, वह बाद में कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा के लिए भी चुनी गयीं। मूलरूप से वह दक्षिण भारत की फिल्मों की हीरोइन थी, जिनका बॉलीवुड में खासा दखल था। फिल्म की कामयाबी की गारंटी थे राजेंद्र कुमार। फिल्म ने उस वक्त ही विदेश में एक करोड़ रुपये का राजस्व जुटाया। इतना ही देश के बॉक्स ऑफिस पर। फिल्मी कहानी तब के दर्शकों को काफी पसंद आयी। पसंद आने के पीछे कारण था सामयिक पटकथा का होना। देश आजाद भी हो गया था। हम उजड़कर बस-रच भी गये थे, लेकिन देश में जो रजवाड़ाशाही के कृमि बच गये थे उनकी संतानें उसी तेवर में नजर आयीं। रजवाड़ों के साहबजादे महिलाओं को वैसा ही खिलौना समझते थे जैसा उनके बाप-दादा। इसी अमीरजादे का रोल निभाया था राजेंद्र कुमार ने। राजेंद्र कुमार का उन दिनों ग्राफ धीरे-धीरे ऊपर चढ़ रहा था। हमराही जैसी फिल्मों ने उनके करिअर को और भी उछाल दिया। फ्लैश बैक में हमराही की बात करते हुए मुबारिक बेगम का जिक्र न करना उस गीत के साथ ज्यादती होगी जो समूची फिल्म की जान थी ‘मुझको अपने गले लगा लो...’ जी हां, पाठक ठीक समझे। यह गीत मुबारिक बेगम ने ही गाया है। मुखड़ा तो मुखड़ा इसके अंतरे को मुबारिक बेगम ने जिन ऊंचाइयों तक पहुंचाया है, वह तो पाठक सुनकर ही अंदाजा लगा सकते हैं। इस गीत में आरोह से अवरोह में आते वक्त उन्होंने जो सुरों से चुहल बाजी की है, वह देखते ही बनती है। यह गीत जैसा कल लोकप्रिय था, वैसा ही आज है। उनकी आवाज में खनक, उनके गीतों में वो सोज़ का पुट कहीं आशा भोसले की याद दिलाता है तो कहीं उनकी बहन लता मंगेशकर की। यही मुबारिक बेगम की आवाज की खूबसूरती है। एक अन्य गीत में भी वह लता का भ्रम देती है वह है गुलज़ार का लिखा गीत-‘रुके रुके से कदम’। यह दुख की बात है कि उन्होंने अंतिम सांस निहायत ही गुरबत के हालात में ली। अब कहानी की ओर, शेखर बने राजेंद्र कुमार मुंबई में अपने माता (ललिता पवार) तथा पब्लिक प्रोसेक्यूटर धर्मदास (नासिर हुसैन) के साथ बड़े ठाठ-बाठ के साथ रहता है। उनके साथ बड़ा भाई महेश (महमूद) उनकी गूंगी पत्नी शांति (शुभा खोटे) तथा उनके तीन बच्चों के अलावा शेखर की इकलौती बहन भी रहती है। उस वक्त का आधुनिक परिवार ऐसा ही था। जब बढ़ती आबादी पर देश को चिंता हुई तो हुक्मरानों ने ‘दो या तीन बच्चे होते हैं घर में अच्छे’ का नारा दिया। बढ़ते लाड़-प्यार और ऐशोआराम की जिंदगी ने शेखर को गलत राह पर डाल दिया। वह लड़कियों का शौकीन था। धर्मदास को शेखर की इस आदत का पता था और वह इसलिए शेखर को पसंद नहीं करते थे। आये दिन उनकी नोंकझोंक चली रहती थी। इसी बची शेखर हेमलता (शशिकला) के प्यार में पड़ जाता है और वह उससे गर्भवती हो जाती है। अपनी मानप्रतिष्ठा पर आंच आते देख धर्मदास अपने साले को हेमलता के पास केस रफा-दफा करने भेजता है। वह ऐसा करने में कामयाब भी हो जाता है। धर्मदास उसके बाद शेखर की शादी शारदा (जमुना) नामक लड़की से करते हैं। शेखर भी पुरानी आदतों पर मिट्टी डाले शारदा से प्यार करने लगता है। एक बार जब शेखर शारदा के साथ बाहर घूमने जाता है तो शारदा बीमार पड़ जाती है। जब धर्मदास वहां पहुंचते हैं तो शेखर वहां नहीं मिलता। इसके विपरीत वह हेमलता के साथ होता है। धर्मदास दुखी होकर घर लौट आते हैं। तभी उनके घर पुलिस इंस्पेक्टर शेखर के नाम का वारंट लेकर आता है। शेखर गिरफ्तार कर लिया जाता है और उसे कोर्ट में पेश किया जाता है। कोर्ट में उसे मौत की सज़ा सुनाने की अपील करने वाला कोई और नहीं, शेखर के पिता धर्मदास ही थे। ऐसा उदाहरण आजकल फिल्मों में ढूंढ़ने पर नहीं मिलता क्योंकि समाज में आदर्श मूल्य गायब हैं। पहले समाज में उदाहरण व्याप्त थे, इसलिए फिल्मों के दर्पण में भी वही दिखाई देता था।

निर्माण टीम प्रोड्यूसर : एल.बी. प्रसाद निर्देशक : टी. प्रकाश राव पटकथा व संवाद : इंद्रराज आनंद गीतकार : हसरत जयपुरी, शैलेंद्र संगीतकार : शंकर जयकिशन सिनेमैटोग्राफी : द्वारका दिवेचा सितारे : राजेंद्र कुमार, जमुना, महमूद शशिकला, ललिता पवार, नासिर हुसैन आदि गीत मुझको अपने गले लगा लो : मुबारिक बेगम, मोहम्मद रफी करके जिसका इंतजार : लता मंगेशकर व मोहम्मद रफी वो दिन याद करो : मोहम्मद रफी व लता मंगेशकर वो चले झटक के : मोहम्मद रफी मन रे तू ही बता : लता मंगेशकर ये आंसू मेरे दिल की जुबान है : मोहम्मद रफी दिल तू भी गा : मोहम्मद रफी मैं अलबेला जवान : मोहम्मद रफी

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