हिंदी फीचर फिल्म: ग़ज़ल

शारा

फिल्म शुरू होते ही ऐसा लगता है कि एजाज़ बने सुनील दत्त के माध्यम से निर्देशक प्रगतिशील कविता/सोच की बात करेगा, खासकर तब जब इसके गीत साहिर लुधियानवी ने लिखे हों लेकिन बात लुका-छिपी, प्यार-मुहब्बत और नायिका नाज़ (मीना) के काकुल-पेंच तक ही सीमित रह जाती है और 'प्यासा' सरीखी मूवी बनने से रह गयी। शायद निर्देशक ऐसा ही चाहता हो क्योंकि फिल्म में जब सुनील दत्त जैसा खूबसूरत नायक और मीना कुमारी जैसी नायिका हो तो क्रांतिकारी बातें करना किसे अच्छा लगेगा? यह बात अलग है कि एजाज़ को इन्कलाब नामक अखबार में काम बतौर एडिटर इसलिए मिलता है क्योंकि वह प्रगतिशील कवि है और ईश्वर की किसी सत्ता में विश्वास नहीं रखता। शायद इसलिए रोजे के दिन हलवा-पूरी खाने से परहेज नहीं करता। वह मुस्लिम समाज की कद्र-कीमतों के खिलाफ है लेकिन शेरवानी और पायजामे जैसे मुस्लिम पारंपरिक लिबास पहनता है। यहीं पर ही लगने लगता है कि निर्देशन में खासा लोचा है। फिल्म अपनी विषय-वस्तु से भटक गयी है। वह विशुद्ध प्रेम कहानी बन गयी है। फिल्म के टाइटल के मुताबिक फिल्म में काफी ग़ज़लें हैं लेकिन ‘ग़ज़ल’ के नाम से जिस साहित्यिक, जिस अदब की झलक दिखनी चाहिए, वह दूर तक नहीं है। इसमें दो राय नहीं कि इस साहित्यिकता के भ्रम को साहिर की नज्मों ने बरकरार रखा है। ‘मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझे’ हीरो से ग़ज़ल गवाकर फिल्म को प्रगतिशीलता का जामा पहनाने की कोशिश की गयी है, जिसमें इनसानी जज्बों को अमीरी और गरीबी के तराजू में तोलने के लिए ताजमहल को आड़े हाथों लिया है। 1964 में रिलीज इस फिल्म को दर्शकों का रिस्पांस अच्छा मिला तो उसके पीछे एक अन्य कारण फ्लैश बैक के पाठकों से साझा करना बनता है कि साहिर के लिखे गीतों को धुनों से सजाया था मेलोडी किंग मदन मोहन ने। ‘शे’र और नगमात की सौगात किसे पेश करूं’ की धुन तब हर मुशायरे में सुनाई देने लगी। तब के गीतकारों ने इसे जी भर के अपनाया। कुला मिलाकर यह फिल्म रोमांस से भरी संगीतमय रचना थी। फिल्म के सैट को देखकर ऐसा लगता है कि यह आगरा का है। फिल्म शुरू ही एजाज़ के परिचय से होती है। नेपथ्य की आवाज़ जो तआरुफ करवाती है, उसके मुताबिक एजाज़ (सुनील दत्त) इन्कलाब अखबार का संपादक है जो प्रगतिशील कवि भी है। एक दिन उसे नवाब वकार अली खान (पृथ्वीराज कपूर) की होली में आयोजित मुशायरे में शिरकत करने का न्योता मिलता है। अभी वह मुशायरे में शिरकत की तैयारी कर रहा होता है कि दिन गुज़रते हुए खिड़की से आ रही तरन्नुम की बयार से भीग जाता है। वह कोई और नहीं, वकार साहिब की बेटी नाज़ (बॉलीवुड की सिन्ड्रेला) मीना कुमारी अपनी ग़ज़ल अपनी सखियों को सुना रही थी। वह जितना मीठा गाती है, उतना खूबसूरत लिखती भी है। एजाज़ उस खनकती आवाज़ पर ऐसे मर मिटता है कि हर बुर्के वाली औरत का दीदार किसी न किसी बहाने कर लेता है। फिर एक दिन नाज़ की गायी ग़ज़ल को अपने अखबार में प्रकाशित कर देता है। यही नहीं, वह नाज़ की गायी ग़ज़ल का मुखड़ा चुराकर मुशायरे में सुना देता है ताकि कोई उज्र कर सके कि यह ग़ज़ल उसकी है। होता भी यही है नाज़ से एजाज़ को खूब तोहमतें मिलती हैं लेकिन शुरुआती नोकझोंक के बाद दोतरफा इश्क शुरू हो जाता है। फिल्म जहां से बोर करती है वह मध्यांतर से पहले ही है, जहां नाज अपने नौकर को बुर्का पहनाकर एजाज़ से मिला देती है। एक-दूसरे से छेड़छाड़ का सिलसिला काफी लम्बा चलता है। यह भी इस कहानी का लोचा है। लगता है कि कथानक को बेवजह खींचा गया है। इन्कलाब अखबार में रोमांस से पगी ग़ज़ल प्रकाशित करने के लिए एजाज़ नौकरी से हाथ धो बैठते हैं क्योंकि अखबार का स्वरूप ही ऐसा है। जब नाज़ के पिता को दोनों की मोहब्बत का पता लगता है तो वह एजाज़ को बंदूक लेकर गोली मारने चला जाता है कि घटिया खानदान के लड़के ने उसकी बेटी की तरफ देखने की हिम्मत कैसे की? नाज़ गुस्से से भरे पिता को रोकने के लिए आवाज़ लगाती है और उसकी आवाज चली जाती है। यहां पर फिल्म हास्यास्पद लगती है। निर्देशन और कथानक की खासी त्रुटि फिल्म को हल्का बनाती है। नाज़ की आवाज ही फिल्म का सेंट्रल थीम है, वह ही चली जाती है। हालांकि, यह आवाज़ अंत में वापस आ जाती है जब रहमान से उसकी शादी होने जा रही होती है। रहमान उसका रिश्ते में कजिन लगता है। फिल्म ‘साहब बीवी गुलाम’ में मीना के पति बने रहमान का, इस फिल्म में रोल उसके व्यक्तित्व से ज़रा मेल नहीं खाता। लेकिन कुल मिलाकर फिल्म देखी जा सकती है।

निर्माण टीम प्रोड्यूसर व निर्देशक : वेद मदान पटकथा : आगा जानी कश्मीरी संवाद : मंजू लखनवी सिनेमैटोग्राफी : जगदीश चड्ढा गीत : साहिर लुधियानवी संगीत : मदन मोहन सितारे : सुनील दत्त, मीना कुमारी, रहमान और पृथ्वीराज कपूर आदि. गीत नगमा-ओ-शे’र की सौगात : लता मंगेशकर इश्क की गर्मिए-जज्बात : मोहम्मद रफी उनसे नजर मिली : लता मंगेशकर, मीना पुरुषोत्तम दिल खुश है आज : मोहम्मद रफी मुझे ये फूल न दे : सुमन कल्याणपुर, रफी अदा कातिल नज़र बर के : आशा भोसले रंग और नूर की बारात : मोहम्मद रफी

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